बहराइच के जंगलों में एक ऐसी लड़की मिली जो कि हाथ के बजाय मुंह से खाना खाती, इंसानों को देखकर चिल्लाने लगती, यहां तक कि उसे कपड़े पहनना तक नहीं आता था। ‘मोगली गर्ल’ नाम से वायरल हो रही इस लड़की के बारे में जब अमर उजाला ने पड़ताल की तो ये सच सामने आया, उसे आगे की स्लाइड्स में देखें... (कंटेंट-फोटो: बहराइच से अतुल अवस्थी, अमर उजाला)
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मोगली गर्ल
बहराइच की कतर्नियाघाट सेंक्चुरी के मोतीपुर रेंज में 20 जनवरी को आबादी से सटे इलाके में एक किशोरी लहूलुहान हालत में मिली थी। बताया जा रहा है कि ये बच्ची बंदरों से घिरी थी और शरीर पर नाममात्र के कपड़े थे। ग्रामीणों की सूचना पर मोतीपुर पुलिस ने उसे सीएचसी पहुंचाकर भर्ती कराया। वहां से उसे जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया। यहां पर इलाज के दौरान उसके घाव तो भर गए। लेकिन मानसिक अस्वस्थता के चलते उसके हाव-भाव अजीब तरह के रहे। जिसके चलते किसी ने उसे मोगली गर्ल घोषित किया तो किसी ने जंगल में वन्यजीवों के बीच किशोरी के रहन-सहन की बात कही।
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मोगली गर्ल
हालांकि जंगल में काम करने वाले समाजसेवी इससे इत्तेफाक नहीं रखते। उनका कहना है कि जंगल इतना बड़ा नहीं जहां मानव दखलंदाजी न हो। वहीं किशोरी का इलाज कर रहे बाल रोग विशेषज्ञ उसके नेपाली मूल के होने की आशंका जता रहे हैं। सीएमओ ने स्वयं किशोरी का स्वास्थ्य परीक्षण किया तो वह मानसिक रूप से पूरी तरह अक्षम मिली। अब उसे केजीएमयू लखनऊ रेफर करने की तैयारी शुरू हुई है। कतर्नियाघाट सेंक्चुरी के मोतीपुर रेंज अंतर्गत नैनिहा गांव जंगल से सटा हुआ है। इस गांव से 200 मीटर की दूरी पर पगडंडियों पर 20 जनवरी को एक किशोरी अर्द्ध नग्न हालत में मिली थी। उसके हाथ और पैरों में गहरे जख्म थे। (आगे स्लाइड्स में जानें क्यों नहीं खाती थी हाथ से खाना...)
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उसे देखकर लग रहा था कि उसे किसी ने फेंका है। ग्रामीणों व राहगीरों की सूचना पर मोतीपुर पुलिस ने मौके पर पहुंचकर किशोरी को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मोतीपुर भर्ती कराया। वहां पर तीन दिन तक इलाज होने के बाद डॉक्टरों ने उसे जिला अस्पताल रेफर कर दिया था। 25 जनवरी को उसे बहराइच जिला अस्पताल पहुंचाया गया। किशोरी का इलाज जिला अस्पताल में वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. केके वर्मा ने शुरू किया। अमर उजाला से बातचीत में डॉ. वर्मा ने बताया कि किशोरी जब अस्पताल लाई गई थी तो उसके हाथ और पैरो में गहरे जख्म थे। किशोरी नेपाली मूल की लग रही है। वह बदहवास हालत में थी। इलाज शुरू हुआ तो डेढ़ माह में फिजिकली तौर से पूरी तरह स्वस्थ हो गई।
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इस मामले में चाइल्ड लाइन को पत्र लिखा गया। लेकिन कोई कवायद नहीं हुई। फिर बाल कल्याण समिति को पत्र भेजा गया। लेकिन किशोरी को लेने कोई नहीं आया। उन्होंने कहा कि मानसिक अस्वस्थता के चलते किशोरी की हरकतें अजीब तरह की हैं। वह कभी मारने दौड़ती है तो कभी अजीब तरह का व्यवहार करती है। किशोरी को मानसिक रोग विशेषज्ञ के इलाज की जरूरत है। इसके लिए किशोरी को केजीएमयू लखनऊ रेफर करने को पत्र लिखा है। मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. अरुणलाल ने बताया कि किशोरी मानसिक रूप से पूरी तरह अक्षम है। चिकित्सीय परीक्षण के दौरान गुरुवार को इसकी पुष्टि हुई है। उन्होंने कहा कि जंगली जानवरों की तरह व्यवहार की बात सामने नहीं आयी।
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वन ग्रामीणों के मुद्दों पर काम करने वाले डेवलेपमेंट ह्यूमन एडवांसमेंट के मुख्य कार्यकारी डॉ. जीतेंद्र चतुर्वेदी ने कहा कि 15 वर्षों से वन ग्रामीणों के बीच काम कर रहा हूं। जंगल बहुत छोटा है। कोई कोना ऐसा नहीं है, जहां मानवदखलंदाजी न हो।आए दिन बाघ और तेंदुए जंगल के बाहर निकल आते हैं। आम आदमी निवाला बनता है। ऐसे में 13 वर्षीय किशोरी के वन्यजीवों के साथ रहने की कहानी गढ़ना हास्यास्पद है। उन्होंने कहा कि किशोरी को मानसिक चिकित्सा की जरूरत है। इसके लिए सीडब्ल्यूसी को कदम उठाना चाहिए।
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मोगली गर्ल
जंगल में मिली किशोरी के मामले में अस्पताल प्रशासन को कई बार पत्र लिखा। सीएमएस ने तो उसे मानसिक स्वस्थ घोषित किया था। पुन: पत्र लिखकर स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला है। किशोरी को लखनऊ इलाज के लिए भेजना ही उचित है। वह मानसिक मंदबुद्धि है। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. केके वर्मा ने बताया कि किशोरी जब जिला अस्पताल लाई गई, उस समय उसके हाथों में गहरे जख्म थे। चोट के कारण वह हाथ से नहीं खा पाती थी। इलाज के बाद सही होने पर वह हाथ से भी खाने लगी।
कतर्नियाघाट सेंक्चुरी की 60 किलोमीटर की सीमा नेपाल से लगती है। जहां पर किशोरी मिली, वहां से नेपाल सीमा की दूरी महज 11 किलोमीटर के आसपास है। उसके चेहरे में भी नेपाली झलक दिखती है। ऐसे में किशोरी के नेपाल का निवासी होने से इंकार नहीं किया जा सकता। अनुमान लगाया जा रहा है कि भटक कर भारतीय क्षेत्र के जंगलों में आ गई होगी।