बात 8 अगस्त 1925 की है, जब शाहजहांपुर में पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के घर ट्रेन डकैती डालकर ब्रिटिश खजाना लूटने की रणनीति बनी। क्रांतिकारी राजेंद्रनाथ लाहिड़ी ने 9 अगस्त को काकोरी में सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर को चेन खींचकर रोक लिया।
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राम प्रसाद बिस्मिल
- फोटो : डेमो
बिस्मिल के नेतृत्व में चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खां सहित 10 क्रांतिकारियों ने खजाना लूट लिया। चादर में रकम बांधी और फरार हो गए। पर, जल्दबाजी में एक चादर वहीं छूट गई।
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राम प्रसाद बिस्मिल
- फोटो : डेमो
बिस्मिल ने आत्मकथा में लिखा है, मुझे तो लग रहा था कि किसी को हमारा पता नहीं लगेगा। पता भी चल गया तो कौन गवाही देगा। पर, 'जिन्हें हम हार समझे थे गला अपना सजाने को, वही अब नाग बन बैठे, हमारे काट खाने को' की कहावत सच साबित हुई। मौके पर पुलिस को मिली चादर में लगे निशान से पता चल गया कि धोबी शाहजहांपुर का है।
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राम प्रसाद बिस्मिल
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उस धोबी ने बता दिया कि चादर बनारसी लाल की है। इसी बीच, बनारसी लाल का रहन-सहन देखकर मुझे शंका तो हुई कि कहीं उसने पूरा भेद तो नहीं खोल दिया। पर, हमारे दल के प्रमुख व्यक्ति का खास था, इसलिए उस पर अविश्वास नहीं कर सका।