मशहूर शायर कैफी आजमी किसी परिचय के मोहताज नहीं। कैफी का जन्म 14 जनवरी को आजमगढ़ में हुआ था, पर उनका लखनऊ और हैदराबाद से जबरदस्त जुड़ाव रहा। हैदराबाद इसलिए क्योंकि इस शहर में एक मुशायरा में भाग लेने गए कैफी की नज्म सुनकर शौकत नाम की लड़की ने अपनी सगाई तोड़कर कैफी के साथ विवाह का फैसला किया।
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कैफी आजमी
- फोटो : डेमो
लखनऊ से कैफी का इसलिए ज्यादा नाता रहा क्योंकि उनके अब्बा ने दीनी तालीम (धार्मिक शिक्षा) हासिल करने के लिए उन्हें लखनऊ के सुल्तानुल मदारिस में दाखिला कराया था। इसलिए कि उनकी औलाद मजहबी रस्मो-रिवाज के बारे में जान ले ताकि उनके मर जाने पर फातिहा तो पढ़ सके।
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कैफी आजमी
- फोटो : amar ujala
कारण, यह था कि कैफी के अन्य भाई तो अंग्रेजी तालीम ले रहे थे। इसलिए अब्बा को फिक्र थी कि कम से कम एक औलाद तो मजहबी शिक्षा हासिल कर ले। कैफी के शागिर्द दीपक मिश्र बताते हैं, ‘लखनऊ में ही एक मुशायरे के बाद उनके मुंबई जाने का रास्ता खुला था। जहां वह शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचे।
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कैफी आजमी
- फोटो : डेमो
विवाह के बाद जब कैफी को आर्थिक तंगी होने लगी तो उन्होंने अखबारों में लिखना शुरू किया। उनकी पहली नज्म लखनऊ से उस समय प्रकाशित होने वाले अखबार ‘सरफराज’ ने छापी। वह अक्सर लखनऊ आया करते थे। एक बार वह मुशायरे में शामिल होने आए।
संयोग से कुछ ही दिन पहले लखनऊ में दंगा हुआ था। लोग तो उम्मीद कर रहे थे कैफी आदत के मुताबिक, लखनऊ की तारीफ करेंगे। पर, यह क्या कैफी ने लखनऊ वालों की खिंचाई शुरू कर दी। लोग कुछ समझ पाते कि इससे पहले ही उनके कंठ से यह गजल फूट पड़ी, ‘अजा में बहते थे आंसू यहां, लहू तो नहीं, यह कोई और जगह होगी लखनऊ तो नहीं।’ पूरी गजल होते-होते कैफी की आंखों से आंसू बहने लगे और सुनने वालों की आंखें गीली हो गई।