बात 1920 की है। कई शहरों में जबरदस्त हिंदू-मुस्लिम तनाव था। लखनऊ भी अछूता नहीं था। अशफाक उल्ला किसी काम से लखनऊ आ रहे थे। बिस्मिल भी उनके साथ आ गए।
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राम प्रसाद बिस्मिल
अशफाक उल्ला के एक रिश्तेदार पुराने लखनऊ में रहते थे। वह उनसे मिलने जा रहे थे। साथ में बिस्मिल भी थे। जैसा सभी को पता है कि बिस्मिल पक्के आर्य समाजी। अशफाक उल्ला पांचों वक्त के नमाजी। बिस्मिल की वेशभूषा देख कोई भी समझ सकता था कि वह हिंदू हैं। वही हुआ।
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अशफाक उल्ला खां
- फोटो : डेमो
पुराने लखनऊ में एक जगह 20-25 लोगों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया और चिल्लाने लगे कि हमारे मोहल्ले में काफिर आ गया है। भीड़ बढ़ गई। इतिहासकार प्रो. पंकज कुमार बताते हैं कि यह देख अशफाक बोले, ‘यह मेरे खालाजात भाई हैं। हम लोग फलां के यहां जा रहे है।’ पर, भीड़ में कुछ लोगों ने कहा, ‘पहनावे से तो ये शख्स हिंदू लगता है।’
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राम प्रसाद बिस्मिल
- फोटो : डेमो
अशफाक बोले, ‘यह उन्नाव से आ रहे हैं। हिंदुओं की आबादी से गुजरने के कारण उन्होंने ये कपड़े पहन लिए। इनका नाम तो बिस्मिल है और काफी अच्छी शायरी करते हैं।’ भीड़ में से कुछ ने कहा तो फिर शायरी सुनाएं। बिस्मिल ने कहा, ‘वक्ते-जिबहा जानवर तक को पिलाते हैं मगर, हजरते-इंसान को पानी पिलाना है मना। मेरे खूं से हाथ रंग कर बोले क्या अच्छा है रंग, पर हमें ताउम्र अब मरहम लगाना है मना।’