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... जब दुकानदार ने 'कैफी आजमी' के पैरों में झुककर मांगी माफी, पढ़ें ये वाक्या

Wed, 28 Nov 2018 04:36 PM IST
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ
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कैफी आजमी - फोटो : डेमो
अक्सर व्यक्ति की पहचान से बड़ा उसका नाम हो जाता है। ‘कैफी आजमी’ यानी अख्तर हुसैन रिजवी भी ऐसे ही थे। कैफी साहब ने 1962 में ‘कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियों, गीत लिखा था, पर, जब 1964 में भारत-चीन युद्ध पर बनी फिल्म में मोहम्मद रफी ने इसे गाया तो यह हिंदुस्तानियों के जुबान पर चढ़ गया। 
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कैफी आजमी - फोटो : डेमो
कैफी के शागिर्द और समाजवादी बौद्धिक सभा के अध्यक्ष दीपक मिश्र बताते हैं, ‘एक ही जगह रहने के कारण बचपन से ही कैफी चचा के यहां आना-जाना रहा। 1994 में उन्होंने हमको बताया था, ‘बात 1965-66 की है। मैं मुंबई से आजमगढ़ आते वक्त लखनऊ में रुका था। पुराने साथियों से मुलाकात के बाद अगले दिन बस पकड़ने चारबाग पहुंचा।
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कैफी आजमी - फोटो : डेमो
वहीं पर चाय के होटल पर बैठकर बस का इंतजार करने लगा। दुकानदार चाय बनाता जा रहा था और ‘कर चले हम फिदा’ भी गाता जा रहा था। पर, वह कहीं-कहीं गलत शब्दों का प्रयोग कर देता। सुनकर मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने उसे टोक दिया। फिर भी वह अपनी ही धुन में मस्त। 

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कैफी आजमी - फोटो : डेमो
जब मैंने दो-तीन बार टोक दिया तो वह झुंझलाकर बोला, ‘टोक तो ऐसा रहे हो जैसे रफी या कैफी हो? चुप बैठिए।’ मैं उसका जवाब सुनकर अचकचा गया। तभी एक साहब आ गए जो मुझे पहचानते थे। बोले, ‘अरे! कैफी साहब आप...।’ 
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कैफी आजमी - फोटो : डेमो
मैं उनका जवाब भी नहीं दे पाया कि देखा वह दुकानदार एकदम मेरे पैरों पर झुका हुआ माफी मांग रहा था। बोला, ‘माफ करिएगा। पहचान नहीं पाया।’ इसके बाद तो उसने जो खातिरदारी की कि पूछिए मत। 
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