‘जो होता है, अच्छा होता है।’ आजादी के आंदोलन में भागीदारी के कारण नारायण दत्त तिवारी कम उम्र में जेल चले गए। पढ़ाई रुक-रुक कर चली। बरेली जेल में रहते हुए जैसे-तैसे प्राइवेट इंटर किया। पिता पूर्णानंद तिवारी ने आर्थिक स्थिति के चलते आगे पढ़ाने से मना कर दिया। पर, चाचा बचीराम व चाची ने चुपके से 50 रुपये देकर उन्हें लखनऊ जाने को कहा।
विज्ञापन
2 of 5
नारायण दत्त तिवारी
- फोटो : डेमो
जुलाई 1944 की एक रात वह चुपके से घर से निकले। कई पहाड़ी नदियों को रात में ही पार करते हुए सुबह काठगोदाम पहुंचकर लखनऊ की रेलगाड़ी पकड़ी। रास्ते में एक प्रोफेसर ने उन्हें लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ने की सलाह दी। तिवारी की जीवनी में इंद्रवर्मा चौहान ने लिखा है, ‘लखनऊ में रेलवे स्टेशन पर उतरकर प्लेटफॉर्म पर ही हाथ-मुंह धुला और विश्वविद्यालय पहुंचकर फॉर्म भर दिया।
विज्ञापन
3 of 5
नारायण दत्त तिवारी
- फोटो : डेमो
कुलसचिव ने तिवारी का नाम सुन रखा था। फॉर्म देखकर चौंके और उसे उप कुलपति को भेज दिया। उप कुलपति ने सोचा कि ऐसे छात्र से यहां का भी माहौल खराब न हो जाए, सो सवाल किया, ‘क्या आंदोलन और अध्ययन एक साथ चल सकता है?’ तिवारी जी ने कहा, ‘चल तो नहीं सकते लेकिन चलाए जा सकते हैं।’ उप कुलपति को तो तिवारी जी को प्रवेश देना ही नहीं था लिहाजा फॉर्म निरस्त कर दिया।
4 of 5
नारायण दत्त तिवारी
- फोटो : डेमो
तिवारी जी ने लखनऊ से ही इलाहाबाद का रास्ता पकड़ा। लखनऊ की घटना से मन आशंकित था। इसलिए उन्होंने इलाहाबाद में आनंद भवन के चौकीदार वंशी से प्रार्थना कर फिरोज गांधी से मुलाकात की। फिरोज तिवारी जी से प्रभावित हुए। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उप कुलपति को पत्र भी लिखा और फीस आदि के लिए 35 रुपये भी दिए।