चौधरी चरण सिंह परिवारवाद के घोर विरोधी थे। उन्हें कतई पसंद नहीं था कि सिर्फ बड़े नेता का पुत्र या पुत्री होने के नाते किसी को राजनीति में महत्व दिया जाना चाहिए। चौधरी साहब की ढलती उम्र के चलते चौधरी अजित सिंह 1984 में देश वापस लौटे। प्रसंग वर्ष 1985 के चुनाव का है।
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चौधरी चरण सिंह
- फोटो : डेमो
‘चौधरी चरण सिंह : गांव से गांधी तक’ पुस्तक से पता चलता है, ‘उप्र लोकदल एवं संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव थे। बोर्ड ने चौधरी साहब के पुत्र चौधरी अजित सिंह का नाम मथुरा संसदीय सीट से प्रस्तावित किया था। टिकटों पर फैसला लेने के लिए दिल्ली में केंद्रीय संसदीय बोर्ड की बैठक हो रही थी।
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मुलायम सिंह यादव
चौधरी चरण सिंह ने जैसे ही अजित का नाम देखा तो उनकी त्योरियां चढ़ गईं। चेहरा लाल। आग बबूला होते हुए उन्होंने मुलायम सिंह से कहा, ‘जिस व्यक्ति को कोई राजनीतिक अनुभव नहीं। देश के किसानों और गरीबी की जानकारी नहीं। उसको राजनीति में उतारकर आप देश में मेेरा मजाक बनाना चाहते हैं?’
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मुलायम सिंह यादव
वह यही नहीं रुके और कहा, ‘मुलायम सिंह, मैं तुमसे यह उम्मीद नहीं करता था, मैंने सोच-समझकर इतने बड़े राज्य का उत्तराधिकार तुम्हें सौंपा है, तुम मेरे सानिध्य में रहकर ट्रेंड हुए हो, ऐसी गलती तुमने क्यों की? मैं तुमसे यह उम्मीद नहीं करता था।’ चौधरी साहब यहीं नहीं रुके बल्कि यह भी कहा, ‘मैंने कांग्रेस के परिवारवाद के विरुद्ध लड़ाई लड़ी।
आप मेरे उसूलों की मेरे जीवित रहते ही हत्या करना चाहते हैं?’ चौधरी साहब की नाराजगी से बैठक में मौजूद सभी नेता स्तब्ध रह गए। बड़ी मुश्किल से बीजू पटनायक, चौ. देवीलाल एवं कर्पूरी ठाकुर एवं जॉर्ज फर्नांडीज ने चौधरी साहब को संभाला। बैठक को स्थगित करनी पड़ी।