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योगी सरकार के तीन साल का हिसाब: निखरा हिंदुत्व का ब्रांड पर हिंदुत्ववादी नेताओं की हत्या से उठे सवाल

Wed, 18 Mar 2020 09:02 PM IST
ishwar ashish राजेंद्र सिंह, अमर उजाला, लखनऊ
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ - फोटो : amar ujala
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले तीन साल में हिंदुत्व के ब्रांड, सख्त प्रशासक, विकासोन्मुख राजनेता और भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की छवि को और निखारा है। फैसले लेने में दृढ़ता दिखाई है।

नोएडा न जाने का मिथक तोड़कर सियासत में अंधविश्वास पर चोट करने वाले सीएम योगी ने नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में हुए हिंसक आंदोलनों से निपटने में जो कड़ा रुख दिखाया, उसका संदेश दूर तक गया है।

पूर्ण बहुमत की सरकार होने के कारण उनसे अपेक्षाएं ज्यादा हैं, कई चुनौतियां भी हैं। अगले दो सालों में जहां योगी सरकार के कामों के परिणाम आएंगे, वहीं उन्हें सियासी इम्तिहान से भी गुजरना होगा।
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- फोटो : amar ujala
18 मार्च को अपनी सरकार के तीन साल पूरे कर रहे 48 वर्षीय योगी आदित्यनाथ भाजपा के पहले मुख्यमंत्री हैं, जो लगातार तीन साल तक इस पद पर रहे हैं। भाजपा के कल्याण सिंह, रामप्रकाश गुप्ता और राजनाथ सिंह प्रदेश की बागडोर संभाल चुके हैं, पर किसी के सिर लगातार तीन साल ताज नहीं रहा। सीएम बनने से पहले योगी यूपी विधानमंडल के किसी सदन के सदस्य नहीं रहे। गोरखपुर लोकसभा सीट से लगातार पांच बार सांसद निर्वाचित हुए थे। विपक्ष में रहते हुए संघर्षों के अनुभव का उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में बखूबी इस्तेमाल किया।
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- फोटो : amar ujala
सत्ता संभालते ही एंटी रोमियो स्क्वायड का गठन किया। अपराधियों पर टूट पड़ने का निर्देश दिया। इसके बाद खूब एनकाउंटर हुए। संगठित अपराध पर काफी हद तक अंकुश लगा। हालांकि अपराध की कई बड़ी घटनाएं सरकार के लिए चुनौती बनी रहीं। इनमें फर्रुखाबाद में 20 बच्चों को बंधक बनाना, सोनभद्र में सामूहिक नरसंहार, नोएडा में मल्टीनेशनल कंपनी से जुड़े गौरव चंदेल और लखनऊ में टेलीकॉम कंपनी के एरिया मैनेजर विवेक तिवारी की हत्या प्रमुख हैं। हिंदूवादी नेता कमलेश तिवारी, हिंदू महासभा के अध्यक्ष रणजीत बच्चन की हत्याएं भी चर्चा में रहीं।

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- फोटो : amar ujala
सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलनों के प्रति कड़े रुख से योगी देश भर में चर्चा में आए। खासतौर से दंगाइयों से संपत्ति के नुकसान की वसूली करने का आदेश और उनकी फोटो सार्वजनिक तौर पर प्रदर्शित करने के फैसले सुर्खियों में रहे। इससे पहले अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उन्होंने प्रदेश में जिस तरह की चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था की, उससे कहीं कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। देश भर में इसकी सराहना हुई है। कथित उपद्रवियों के फोटो चौराहों पर चस्पा करने के आदेश पर हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कानून नहीं होने का हवाला दिया तो योगी सरकार ने अध्यादेश लाकर इसे कानूनी जामा पहना दिया।
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ - फोटो : amar ujala
सांस्कृतिक सरोकारों के पैरोकार
योगी जिस गोरक्षनाथ पीठ के पीठाधीश्वर हैं, उसका धर्म-संस्कृति के संरक्षण में विशिष्ट योगदान व पहचान रही है। उनके गुरु और पूर्व सांसद महंत अवेद्यनाथ राम जन्मभूमि मंदिर आंदोलन के अग्रणी नेता रहे हैं। योगी उनकी परंपरा के वाहक के रूप में सांस्कृतिक सरोकारों के मुखर पैरोकार के रूप में उभरे हैं। मुख्यमंत्री बनने से पहले से उनकी छवि प्रदेश में हिंदुत्व के चेहरे की थी। उन्होंने इसे अपने फैसलों से देश भर में हिंदुत्व के ब्रांड के रूप में बदला है। भले ही इसके लिए उनके बयान चर्चा में क्यों न आए हों ?
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- फोटो : amar ujala
विकास की चिंता, कड़ी मेहनत
योगी ने विकास को अपना एजेंडा बनाया है। जेवर इंटरनेशनल ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट का वर्षों से अटका प्रोजेक्ट उनकी प्रतिबद्धता के कारण ही धरातल पर उतरने जा रहा है। इन्वेस्टर्स समिट, ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी, चार-चार एक्सप्रेस-वे का निर्माण, पूरब को पश्चिम से जोड़ने वाले गंगा एक्सप्रेस-वे की तैयारी समेत कई परियोजनाओं पर काम चल रहा है। भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की उनकी नीति है। आधा दर्जन पीसीएस अधिकारियों को बर्खास्त करने के साथ ही दर्जनों कार्मिकों पर कार्रवाई कर चुके हैं।
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- फोटो : amar ujala
छवि से समझौता नहीं
अली बनाम बजरंग बली का उनका बयान खूब चर्चा में रहा। पश्चिमी यूपी की तुलना कश्मीर से करने का मामला हो, अपराधियों को ठोक देने का या सीएए विरोधी धरनों में महिलाओं की उपस्थिति पर विवादित बयान, उन्होंने अपनी छवि से कभी समझौता नहीं किया। बेबाकी से राय रखी। अयोध्या, काशी, मथुरा समेत सांस्कृतिक, धार्मिक स्थलों के पुनरुद्धार के लिए बड़ी योजनाएं बनाईं और उन्हें लागू कराया। प्रयागराज कुंभ जिस भव्यता के साथ समापन हुआ, उसने भी यूपी के बारे में धारणा बदलने का योगदान दिया।
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आगामी दो साल राजनीतिक कौशल की लेंगे परीक्षा
योगी सरकार ने विकास की जो परियोजनाएं शुरू की हैं, वे अगले दो सालों में धरातल पर दिखने लगेंगी। पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे का उद्घाटन हो जाएगा। बड़े निवेश वाले कई प्रोजेक्ट शुरू हो जाएंगे। यानी काम का नतीजा आना प्रारंभ हो जाएगा और इसी के साथ इम्तिहान का दौर भी शुरू हो जाएगा।

विधान परिषद के शिक्षक व स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनावों की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। इसी साल के आखिर में पंचायत चुनाव प्रस्तावित हैं, जो अगले साल के मध्य तक जाएंगे। इसके साथ ही विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका होगा। उन पर भाजपा को सत्ता में वापस लाने की चुनौती होगी। अगले दो साल योगी के राजनीतिक कौशल की परीक्षा के होंगे।
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