याद करिए वह दिन, कैसे जनता ने खुद कर्फ्यू लगाया था। गुलजार रहने वाले लखनऊ में हर तरफ सन्नाटा पसरा था। शाम-ए-अवध की पहचान हजरतगंज सूना हो गया। अमीनाबाद, चौक की कभी न सोने वाली गलियां मौन हो गईं। ट्रांसगोमती में गोमतीनगर, इंदिरानगर, अलीगंज, जानकीपुरम और डालीगंज का इलाका हो या फिर सिस गोमती में आलमबाग, कैंट, कृष्णानगर और आशियाना का इलाका, सब जगह सड़कें सूनी हो गईं।
हमेशा जागने वाले चारबाग को भी पहली बार लोगों ने सोते देखा था। लोगों ने दिखा दिया था कि हम जो ठान लेते हैं, वह करके दिखाते हैं। यही नहीं शहर के सन्नाटे को शाम को घंटा-घड़ियाल बजाकर तोड़ने में भी कोई पीछे नहीं रहा। महामारी के खिलाफ एकजुट शहर के पढ़े-लिखे आधुनिक परिवेश में जी रहे तबके ने भी ओमेक्स हाइट्स जैसे आधुनिक अपार्टमेंट की बालकनी में खड़े होकर शहर को घंटा, घड़ियाल व शंखध्वनि से गुंजायमान कर दिया।