उनका हर अंदाज अलग है। संस्कृति के आंगन में उनकी मौजूदगी एक सुखद अहसास कराती है। संघर्ष से सफलता के इस सफर को उन्होंने एक खास मकसद के साथ पूरा किया। कॅरिअर को नए आयाम देने के साथ-साथ वे तय कर चुकी हैं कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को सहेज कर रखना है। एक तरफ वे नई पीढ़ियों को तैयार कर उनके रूप में विरासत को संरक्षित कर रहीं। दूसरी ओर उन्होंने कुछ सामाजिक सरोकारों को पूरा करने का वादा खुद से किया। कला-संस्कृति और साहित्य की सशक्त हस्ताक्षर। ऐसी हस्तियों पर पेश है रोली खन्ना की रिपोर्ट...
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मां की परछाईं पेंटर बिटिया
पढ़ने से ज्यादा तृप्ति पाहवा को ड्राइंग अच्छा लगता था। कलर और ब्रश से लगाव ने उन्हें म्यूरल आर्टिस्ट बना दिया। पर, उनका दायरा कहीं ज्यादा विस्तार लिए है। आर्टिस्ट होने के साथ-साथ वे ऐसी गुरु हैं, जिनके स्टूडेंट्स में 14 साल से लेकर 55 साल तक की महिलाएं हैं। यही नहीं, आर्ट थेरेपी के जरिए वे कई युवतियों की जिंदगी में दोबारा खुशियां लेकर आईं। वे मोटिवेशनल स्पीकर नहीं हैं, लेकिन आर्ट सिखाते-सिखाते लोगों के जीवन को एक दिशा दे रही हैं। तृप्ति के स्टूडेंट दुबई, कनाडा, न्यू जर्सी, गुजरात, मुंबई तक में हैं जिन्हें वे ऑनलाइन सिखाती हैं। फिलहाल वे अमेरिका के एक रेस्टोरेंट के लिए इंडियन हेरिटेज पर पेंटिंग का ऑर्डर पूरा करने में व्यस्त हैं। कहती हैं कि आर्ट को कॅरिअर बनाने से लोग इसलिए हिचकते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इसमें कमाएंगे क्या। सच तो ये है कि लोगों को मालूम नहीं कि आर्ट की मार्केटिंग भी होती है। लोगों को हम इसके बारे में भी सिखाते हैं। बेटी में ट्रांसफर हो गया हुनर
तृप्ति गर्व से कहती हैं, गुलप्रीत ने सच कर दिखाया कि बेटी मां की परछाईं होती है। यूं तो वह इंटीरियर डिजाइनर बनना चाहती है, लेकिन मैं गर्व से कह सकती हूं कि उसे वह सबकुछ आता है, जो मैं कर सकती हूं। मिनिएचर हो, म्यूरल आर्ट हो या फिर कुछ और। गुलप्रीत के मुताबिक, अच्छा लगता है मम्मी के साथ काम करके। स्कूल में जब मैंने पहली बार मिट्टी के गणेश बनाए थे, तब किसी ने यकीन नहीं किया था, मुझे फिर से बनाकर दिखाना पड़ा। आज लोगों को विश्वास है कि मेरी बनाई पेंटिंग्स भी डिमांड में हैं। (तस्वीर में- मां तृप्ति पाहवा, बेटी गुलप्रीत)
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रंगमंच पर दो पीढ़ियां एक साथ
एक तरफ लोग ग्लैमर के पीछे भाग रहे हैं। एक-दो नाटक किए और निकल पड़ते हैं टेलीविजन या फिल्मी दुनिया में संघर्ष करने। पर, राजधानी में हुसैनगंज निवासी रंगकर्मी अचला बोस ही नहीं, उनकी दोनों बेटियां दीपिका और श्रद्धा रंगमंच से जुड़ी तो उसी की होकर रह गईं। अचला बताती हैं कि वह 1985 में आकांक्षा थियेटर के जरिए रंगमंच से जुड़ीं। रंगमंच से जुड़ाव के कारण ही उन्हें 2007 के लिए 2016 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया। बेटियों के थियेटर से जुड़ने के बाबत कहती हैं कि दोनों ने खुद ही तय किया कि उन्हें रंगमंच से ही जुड़ना है। 200 से अधिक नाटक कर चुकीं दीपिका बताती हैं, पहला नाटक पांच साल की उम्र में किया था। भातखंडे से कथक सीखा, लेकिन नृत्य से ज्यादा मन थियेटर में लगा। टेलीविजन में काम के बारे में कहती हैं कि थियेटर में स्ट्रगल जरूर है, लेकिन यह वास्तविकता के करीब है। टेलीविजन में वह बात नहीं। वहीं पिछले 14 साल से नाटक करती आ रहीं श्रद्धा कहती हैं कि भातखंडे से क्लासिक वोकल सीखा, लेकिन घर में थियेटर का माहौल था, इसलिए इसमें अपने आप रुचि बढ़ने लगी। अब तो यही हमारा जुनून है। सिर्फ नाटक नहीं, एक संदेश भी
‘अहसास’ जैसे नाटक करके अपनी पहचान बनाने वाली अचला बोस कहती हैं कि रंगकर्म हमारे लिए समाज सेवा की तरह है। इसके जरिए हम अक्सर एक गंभीर मुद्दे को उठाते हैं। जैसे ‘अहसास’ एक दिव्यांग बच्चे की कहानी है, इसी तरह नाटक के जरिए हमने महिला मुद्दों को उठाने की कोशिश की है। दीपिका कहती हैं, यह सच है कि रंगकर्म एक वर्ग विशेष तक सीमित होकर रह गया है, लेकिन युवाओं के इससे जुड़ने के कारण यह नई पीढ़ी की पसंद बनता जा रहा है। (तस्वीर में- मां अचला बोस, बेटियां दीपिका और श्रद्धा / रंगकर्मी)
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वाह ! वायलिन
पर मां-बेटी की जुगलबंदी
महानगर में एक घर ऐसा भी है जहां सुबह की शुरुआत वायलिन की सुमधुर धुनों से होती है। यहां जुगलबंदी होती है मां नंदिता पंडित और बेटी रत्नांगी पंडित के बीच। 30-45 मिनट के रियाज के बाद दोनों अपने-अपने काम में लग जाती हैं। संध्यावंदन की तरह यह सिलसिला शाम को भी बना रहता है। नंदिता बताती हैं, दरअसल मुझे तालीम हमारे पिता पं. दाऊजी गोस्वामीजी ने दी। उनको बजाता देख मुझे अच्छा लगता था। पिताजी की दी तालीम के साथ ही भातखंडे से हमने म्यूजिक वोकल एंड वायलिन में पढ़ाई की। लॉरेटो, शेरवुड में अपनी सेवाएं दे चुकीं नंदिता बताती हैं कि बेटी को समय नहीं दे पाने के कारण मैंने स्कूल छोड़ा। फिलवक्त कुछ बच्चों को तालीम दे रही हूं। नंदिता की स्टूडेंट्स दिशा और परीक्षा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहतरीन प्रस्तुतियां दे रही हैं। एन. राजन जैसा बनने की ख्वाहिश
ला-मार्टीनियर की स्टूडेंट रत्नांगी कहती हैं, यह अलग बात है कि अपने स्कूल में वायलिन प्लेयर सिर्फ मैं हूं। अच्छा लगता है जब किसी भी प्रोग्राम के लिए टीचर्स कहती हैं, ‘रत्नांगी विल डू इट’। रत्नांगी नाना और मम्मी को तो आदर्श मानती ही हैं, साथ ही सुप्रसिद्ध वायलिन वादक एन. राजन जैसा बनना चाहती हैं। खास बात है कि कक्षा आठ में पढ़ने वाली रत्नांगी अपने थियेटर आर्टिस्ट पापा को स्टेज पर म्यूजिक में मदद करती हैं। (तस्वीर मेंः नंदिता पंडित, रत्नांगी पंडित/ वायलिन वादक)
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गौरवान्वित करती तबले की थाप
महज छह साल की थी वह, जब उसने पहली बार पंडित किशन महाराज सभागार में तबला बजाया था। वहां मौजूद संगीत प्रेमियों ने कहा था कि इसके तबले की हर थाप इसके बेहतरीन भविष्य का संकेत दे रही है। तबसे पढ़ाई के साथ-साथ उसका रियाज जारी है। गर्विता मिश्रा के पिताजी स्वयं एक तबला वादक हैं और भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय में तालवाद्य विभाग में विभागाध्यक्ष हैं। गर्विता कहती हैं, आमतौर पर तबला पुरुष वाद्य माना जाता है, पर, अब लड़कियां भी इसमें अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। मंच शेयर कर रही हैं, टीचिंग में भी अच्छा स्कोप है। सीएमएस की छात्रा गर्विता (16) को उनके बेहतरीन प्रदर्शन के कारण 2016 में राष्ट्रीय छात्रवृत्ति मिली। पापा की विरासत अब मेरी
गर्विता कहती हैं, मैं जब छोटी थी तभी पापा के साथ प्रोग्राम में जाती-आती थी। हालांकि पापा ने कभी मुझ पर तबला सीखने के लिए दबाव नहीं डाला, लेकिन जब बजाने लगी तो रियाज के अनुशासन का पाठ उन्होंने ही पढ़ाया। मैं चाहती हूं कि पापा गर्व करें कि उनकी बेटी ने उनकी विरासत संभाली। मैं बनना तो आर्किटेक्ट चाहती हूं, पर तबला वादन मेरा पैशन है। (तस्वीर में- गर्विता मिश्रा/ तबला वादक)
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भारतीय भाषाओं को बचाने में जुटीं
इन दिनों शहर में भारतीय भाषाओं व बोलियों को बचाने की एक अनूठी मुहिम छिड़ी हुई है। कभी किसी के घर की बैठक, कभी किसी स्कूल तो कभी किसी ऑडिटोरियम में कुछ लोग आपको अलग-अलग कहानियों का पाठ करते मिल जाते हैं। दरअसल कहानियों, भारतीय भाषाओं और बोलियों को बचाने की इस अनूठी पहल को नाम दिया गया है कथा कथन। इसके लखनऊ चैप्टर की शुरुआत करने का श्रेय जाता है आकाशवाणी की वरिष्ठ उद्घोषिका नूतन वशिष्ठ व उनकी टीम को। नूतन बताती हैं, कथा कथन की शुुरुआत मार्च 2016 में मुंबई में जमीर गुलरेज ने की। उनकी पत्नी रेखा राव मेरी अच्छी मित्र हैं। उनसे हमें जानकारी मिली। यह कोशिश अच्छी लगी, बस यहीं से प्रेरणा मिली और 2017 में लखनऊ चैप्टर की शुरुआत हो गई। इसके बाद हम लोगों ने इलाहाबाद चैप्टर शुरू किया। लोगों से जुड़ने की कोशिश
नूतन बताती हैं कि पुनीता और अनुपमा शरद हमारी एक्टिव मेंबर हैं। हम स्कूल-स्कूल संपर्क करते हैं। बाल संरक्षण गृह तक जाते हैं। हमारा मानना है कि यदि एक भी युवा को कहानी समझ में आ गई तो वह इंटरनेट पर सर्च करेगा, इससे साहित्य अन्य लोगों तक पहुंचेगा। (तस्वीर में- नूतन वशिष्ठ/ उद्घोषिका)
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जिंदगी का मकसद लोगों को कला से जोड़ना
पति के तबादले के साथ ही जगह बदलती रहती थी। नए-नए अनुभव मिलते। लोक गायन और कविता लेखन दोनों साथ-साथ चल रहा था। इस बीच पति का ट्रांसफर लखनऊ हो गया। लोक गायिका, कवयित्री उमा त्रिगुणायत बताती हैं, लखनऊ आने के बाद अहसास हुआ कि एक कलाकार के लिए मंच कितना जरूरी होता है। इसी सोच ने सांस्कृतिक एवं शैक्षिक संगठन अल्पिका को जन्म दिया। कवि गोष्ठियों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराने वाली उमा पिछले तीस साल से कलाकारों को मंच प्रदान करने के साथ-साथ लगातार उन्हें निखारने का भी काम कर रही हैं। 80 साल से भी अधिक की उम्र में उनका जज्बा कई युवाओं को मात देता दिखता है। कहती हैं कि पारिवारिक जिम्मेदारियां पूरी कर दीं, कुछ अपनी संतुष्टि के लिए भी तो करना है न। मां की प्रेरणा ने बना दिया कोरियोग्राफर
उमा की बेटी रेणु ने अपनी पहचान कोरियोग्राफर व कथक गुरु के रूप में बना ली है। भातखंडे संगीत विवि से विरासत करने के बाद स्कॉलरशिप लेकर पं. बिरजू महाराज से प्रशिक्षण हासिल किया। हाल ही में उन्होंने सुपर-30 फिल्म के लिए कोरियोग्राफी की है। शास्त्रीय नृत्य के अलावा वे लेखन व साहित्य में भी उतना ही दखल रखती हैं। उन्होंने लखनऊ, देहरादून, मुंबई समेत कई शहरों में शिष्यों को मंच दिया है। टीवी सीरियलों में नृत्य निर्देशन के अलावा राजस्थानी फिल्म बाबा रामदेव पीर व हिंदी फिल्म शतरंज के खिलाड़ी में भी काम किया है। 2018 में उन्हें स्मार्क अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। (तस्वीर में- उमा त्रिगुणायत, रेणु शर्मा (बेटी) लोक गायिका/ नृत्यांगना)
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बहुत देर से सीखना शुरू किया, पर क्लास में आगे रही
बचपन से ही डांस सीखना चाहती थीं, लेकिन घर से इसलिए नहीं निकल सकीं क्योंकि कोई ले जाने-लाने वाला नहीं था। थोड़ी बड़ी हुईं, रास्तों की समझ आई तो घर से जाने की इजाजत मिली और नेहा मिश्रा ने डांस क्लास जॉइन कर ली। कथक गुरु स्व. पंडित अर्जुन मिश्रा के बेटे पं. अनुज मिश्रा उनके बचपन के मित्र थे। उन्होंने ही अपने पिता की क्लास जॉइन करने की सलाह उन्हें दी। कथक गुरु ने उनका डांस देखा तो उन्हें अपनी शिष्या बना लिया। दस साल तक उनसे कथक सीखा। नेहा कहती हैं, मैंने कथक देर से सीखना शुरू किया, लेकिन पर क्लास में हमेशा आगे रही। खास बात है कि शिष्या से बहू बनीं नेहा अपनी पारिवारिक परंपरा को बखूबी सहेज रही हैं। जब बॉलीवुड भी हुआ उनके डांस का दीवाना
नेहा ने अपनी ननद के साथ रियलिटी शो में हिस्सा लिया था। कहती हैं, जब लारा दत्ता समेत सभी जजों ने मेरी तारीफ की तो लगा कि यह मेरी नहीं, लखनऊ घराने की देन है। नेहा बताती हैं, मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं था। वेट भी 99 किग्रा हो गया था, लेकिन थोड़ी सी ज्यादा मेहनत ने सब ठीक कर दिया। देश-विदेश में अपना हुनर दिखा चुकीं नेहा कहती हैं कि फिलहाल मेरी कोशिश कथक में पारंगत ऐसे डांसर तैयार करना है, जो दुनिया तक लखनवी घराने की खुशबू पहुंचा सकें। (तस्वीर में- नेहा मिश्रा/ नृत्यांगना)
यायावर लेखिका
रिटायरमेंट की उम्र में लोग थक-हार कर बैठ जाते हैं या सुविधाओं से दिन गुजारने की कोशिश करते हैं, लेकिन विनीता मिश्रा की बात ही कुछ अलग है। वे इन दिनों यायावरी में व्यस्त और मस्त हैं। जितनी शांत वे खुद हैं, उतनी ही दूर तक जाती है उनके लिखे शब्दों की आवाज। उनकी लेखनी स्त्री के विभिन्न मनोभाव, नारी सशक्तीकरण, आध्यात्मिक व सामाजिक विसंगति को आईना दिखाती नजर आती है। साइंस की स्टूडेंट होकर हिंदी में लेखन व रुचि के बारे में कहती हैं, बचपन से लिखती रही हूं। मेरी बेटी ने मेरा परिचय अपने दोस्तों से कराया। उसकी ही एक दोस्त ने मुझे बताया कि आपके लिखे हुए को पढ़ना लोगों का अधिकार है। इसके बाद ही मैंने छपने का महत्व जाना। कई कविताएं व लेख प्रकाशित हो चुके हैं। दो कविता संग्रह प्रकाशन की ओर हैं। कोई संस्था नहीं, बस अपना काम किए जा रहीं
अक्सर वे गरीब बच्चों को पढ़ाती दिख जाती हैं तो कभी बस्तियों में पोलियो ड्रॉप का महत्व बताने पहुंच जाती हैं। फिलहाल महिलाओं को आर्थिक निर्भरता के महत्व का पाठ पढ़ा रही हैं। साथ ही अंगदान के लिए लोगों को प्रेरित कर रही हैं। (तस्वीर में- विनीता मिश्रा)