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28 साल पहले पाकिस्तान से आकर लखनऊ में बसे इन परिवारों ने देखा खौफनाक मंजर, जानें-इनकी कहानी

Fri, 13 Dec 2019 06:21 PM IST
ishwar ashish ज्ञान सक्सेना, अमर उजाला, लखनऊ
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भारत के नागरिक। - फोटो : amar ujala
कहानी का ये हिस्सा आज तक सब से छुपाया है।
कि हम मिट्टी की खातिर अपना सोना छोड़ आए हैं।
यकीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद
हम अपना घर, गली, अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं।

शायर मुनव्वर राना की ये पंक्तियां यूं तो देश के बंटवारे के समय हिंदुस्तान से पाकिस्तान गए और वहां मुहाजिर कहलाए लोगों के लिए लिखी गई थीं। ...लेकिन ये पंक्तियां पाकिस्तान में अमानवीय अत्याचारों से त्रस्त होकर भारत आए और यहां शरणार्थियों की तरह रह रहे उन निर्वासित लोगों पर भी फिट बैठती हैं जो वहां अपना सब कुछ छोड़ आए।

28 साल पहले कई हिंदू परिवार पाकिस्तान के सिंध प्रांत से आकर लखनऊ में बस तो गए लेकिन कानूनी दांवपेच के कारण भारतीय नागरिकता नहीं पा सके। कई परिवारों को तो चिन्हित कर लिया गया था लेकिन बहुत से परिवार ऐसे भी थे जो गुपचुप तरीके से यहां रह रहे थे। सदन में नागरिकता संशोधन बिल पास होने के बाद इन परिवारों की खुशी का ठिकाना नहीं है। पेश है इन परिवारों के दर्द से लेकर दुआ और अब दवा मिलने तक की कहानी पर एक विशेष रिपोर्ट :
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भारत के नागरिक। - फोटो : amar ujala
निर्वासित का नागरिकों का कलंक लिए राजधानी पहुंचे परिवारों में से कुछ ने हिम्मत कर जिल्लत भरी जिंदगी से बचने को भारतीय नागरिकता पाने को आवेदन किया था। कृष्णानगर से जुड़े एक मोहल्ले में रह रहे इन निर्वासित सिंधी परिवारों ने 28 साल पहले तो स्नेह नगर आलमबाग में रह रहे रामदेव के परिवार ने 20 साल पहले भारतीय नागरिकता पाने के लिए आवेदन किया था।

दस्तावेजी औपचारिकता पूरी न हो पाने से परिवार के कई सदस्यों का भारतीय नागरिकता पाने का सपना अभी तक पूरा नहीं हो पाया है। नागरिकता बिल के पारित हो जाने से अब ऐसे निर्वासित हिंदू परिवारों में बिना परेशानी के भारतीय नागरिकता पाने का सपना पूरा होता लग रहा है।

इनके चेहरों पर लंबी भागदौड़ के बाद भारतीय बनने की खुशी से लौटी मुस्कान पुरानी पीड़ा दूर होने का अहसास दिलाने लगी है। जनवरी 2018 में भारतीय नागरिकता का प्रमाणपत्र प्राप्त कर चुके हरीलाल, रीता बाई, पुरुषोत्तम से लेकर सरिता व महेश तक अब जिल्लत भरे तानों से मिलने वाली पीड़ा से पहले ही छुटकारा पा चुके हैं।
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- फोटो : amar ujala
संवरेगा बच्चों का भविष्य, नहीं झेलनी पड़ेगी परेशानी
कभी न भूलने वाले जख्मों का दर्द समेटे शहर के कृष्णानगर इलाके में निवास कर रहे रामदेव हसवानी के परिवार के सात लोग 1989 में पाकिस्तान के सिंध प्रांत से निर्वासित होकर रिश्तेदारों के पास राजधानी पहुंचे थे।

वर्ष 1991 में 28 साल पहले दीर्घकालीन वीजा (एलटीवी) के आधार पर भारतीय नागरिकता पाने का आवेदन किया था। दो साल पहले जनवरी में परिवार के पांच सदस्यों को तो नागरिकता प्रमाणपत्र मिल गया लेकिन दस्तावेजी अभिलेख पूरे न होने से रामदेव अब भी कलेक्ट्रेट के चक्कर काटने को मजबूर हैं।

बोले, नए कानून के बाद अब जल्दी निर्वासित का ठप्पा हटेगा। इससे खुद तो सरकारी नौकरी नहीं पा सका लेकिन अब दोनों बच्चों का बेहतर भविष्य बना कर पत्नी शकुंतला के साथ उन्हें बेहतर जीवन दे सकूंगा।

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भारत के नागरिक। - फोटो : amar ujala
मुसीबतें सहीं फिर भी नहीं हारी हिम्मत
बीस साल पहले पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर बढ़े जुल्मों के बाद परिवार के अन्य सदस्यों के साथ लखनऊ के प्रेम नगर में आकर बसे राजेश कुमार पुत्र अशोक कुमार के अन्य सदस्यों को तो भारतीय नागरिकता प्रमाणपत्र मिल गया है लेकिन वह और उनका भाई गोविंद अभी भी दस्तावेजी अभिलेख पूरे कराने को लेकर परेशान हैं।

पाकिस्तानी पासपोर्ट का वीजा काफी पहले ही एक्सपायर हो जाने से पुलिस रिपोर्ट न लग पाने से नागरिकता प्रमाणपत्र पर अड़ंगा लगा है। राजेश कुमार ने कहा कि नए कानून ने नागरिकता प्रमाणपत्र जल्द मिलने की उम्मीद को परवान चढ़ा दिया है।

नागरिकता प्रमाणपत्र न होने के कारण पढ़ाई लिखाई से लेकर जीवन यापन को नौकरी पाने तक में तमाम मुसीबतें झेलीं। इसके बाद भी परिवार के सदस्यों ने हिम्मत नहीं हारी। अब परिवार के बचे दोनों भाईयों को भी जल्द नागरिकता मिल जाने से आने वाली पीढ़ी का जीवन संवर जाएगा।
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बिना नागरिकता के हर कदम पर उठाई दिक्कत
भारतीय नागरिकता न मिल पाने से निर्वासित परिवार न तो किसी बैंक में अपना खाता संचालित कर पा रहे थे और न ही इनके पास मतदान का कोई अधिकार था। खुद की अपनी पहचान न होने से सरकारी योजनाओं का भी कोई फायदा इन परिवारों को नहीं मिलता था। सबसे ज्यादा परेशानी तो ऐसे परिवार के बच्चों व युवाओं को झेलनी पड़ती थी।

उन्हें न तो किसी अच्छे स्कूल में प्रवेश मिल पाता  और न ही किसी सरकारी नौकरी में आवेदन का मौका। इतना ही नहीं पैनकार्ड न बन पाने से ऐसे परिवार के समक्ष खुद का व्यवसाय करना भी बड़ी चुनौती रहता था। सामाजिक तौर पर भी ऐसे निर्वासित परिवार के लोगों को न केवल सशंकित नजरों से देखा जाता है बल्कि पाकिस्तानी होने का ताना भी झेलना पड़ता था।
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- फोटो : एएनआई
नागरिकता के साथ सौगातें भी मिलेंगी
- रिजर्व बैंक की अनुमति के बिना किसी भी राष्ट्रीयकृत बैंक में खुलवा सकेंगे खाता
- परिवार के भरणपोषण को स्वरोजगार, बिजनेस करने का भी मिलेगा मौका
- डीएल व पैन कार्ड बनवाने की भी मिलेगी सुविधा
- कुछ शर्तो के साथ मकान व अचल संपत्ति खरीदने की मिलेगी अनुमति
- राज्य के अन्य जिलों में बिना अनुमति आवागमन की सुविधा
- वीजा दस्तावेज एक से दूसरे राज्य में स्थानान्तरित करने भी अनुमति मिलेगी। (तस्वीर में भारत के गृहमंत्री अमित शाह ने नागरिकता संशोधन बिल पेश किया।)
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भारत के नागरिक। - फोटो : amar ujala
सिंधी एवं पंजाबी समाज ने अमीनाबाद में बांटे लड्डू
सिंधी व पंजाबी समाज के लोगों ने राज्यसभा में नागरिकता बिल पास होने पर बृहस्पतिवार को लड्डू बांटकर खुशी मनाई। आलमबाग, गोमती नगर व अमीनाबाद में नागरिकता बिल पास हो जाने पर सिंधी एवं पंजाबी बाहुल्य बाजारों में संगठनों के पदाधिकारियों के साथ लड्डू बांटे गए। प्रमुख पदाधिकारियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह को फैक्स व ईमेल से उन्हें बधाईयां भेजीं। संगठन के अशोक मोतियानी, अनिल बजाज, श्याम कृष्णानी, सुरेश छाबलानी, घनश्याम दास केसवानी, मनी सरदार, अनिल आनंद, प्रमोद सोनकर, राजन बचानी, पुनीत लालचंदानी व गुरमीत सिंह समेत तमाम ने अमीनाबाद में लड्डू बांटे।
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