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जानें- उस शख्स के बारे में, जिसके छापाखाना ने खुलवा दिया था यूपी का बड़ा डाकघर

Thu, 07 Mar 2019 03:31 PM IST
ishwar ashish अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला लखनऊ
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मुंशी नवल किशोर - फोटो : डेमो
कुछ लोग इतिहास बनाने के लिए जाने जाते हैं। मुंशी नवल किशोर ऐसे ही शख्स थे। ब्रज की भूमि से अवध की सरजमीं पर आए और फिर यहीं के होकर रह गए। भले ही आज लखनऊ में एक से एक सुंदर छपाई हो रही हों लेकिन एक समय था जब लखनऊ ही नहीं उत्तर भारत में छपाई की कोई बात मुंशी नवल किशोर के बिना अधूरी ही रहती थी।
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मुंशी नवल किशोर - फोटो : डेमो
1857 के विप्लव और अंग्रेजी फौजों की तरफ से लखनऊ में मचाई गई तबाही के शोले अभी शांत भी नहीं हुए थे कि तभी ब्रज भूमि का एक साहसी उद्यमी और कल्पनाशील युवक 23 नवंबर 1858 को एक तरह से खाली हाथ लखनऊ आया। उसने एक छोटी सी मशीन से छपाई का काम शुरू कर 1882 आते-आते मुंशी नवल किशोर प्रेस को पेरिस के एलपाइन प्रेस के बाद संसार का सबसे बड़ा छापाखाना बना दिया
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मुंशी नवल किशोर - फोटो : डेमो
डॉ. रणजीत भार्गव ने संस्मरण में लिखा है कि थोड़े ही दिन में प्रेस की ख्याति दुनिया भर में फैल गई। हिंदी, उर्दू, फारसी का दुनिया का कोई ऐसा विद्वान नहीं था जिसकी कृति इस प्रेस ने न छपी हो। छापाखाना रोज एक लाख 93 हजार पन्नों की छपाई करने लगा। लगभग 1200 कर्मचारी छापाखाना में काम करने लगे।

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मुंशी नवल किशोर - फोटो : डेमो
छापाखाना के संस्थापक मुंशी जी के नाम दुनिया भर से सालाना लगभग 25,000 खत आने लगे। डाकखर्च प्रतिवर्ष 50,000 रुपये पहुंच गया। डाक विभाग के कर्मचारियों को दिन में कई-कई बार यहां आना-जाना पड़ता।
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मुंशी नवल किशोर - फोटो : डेमो
लिहाजा उस समय की हुकूमत ने हजरतगंज में ही नवल किशोर प्रेस के पास ही जीपीओ स्थापित करने का फैसला किया। इस प्रकार मुंशी जी का बड़ा छापाखाना प्रदेश के बड़े डाकघर का भी जन्मदाता बना।
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