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... ओह तो इसलिए चुनाव लड़ते-लड़ते रह गए भगवती बाबू, पढ़ें ये पूरा मामला

Thu, 28 Feb 2019 04:43 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
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भगवती चरण वर्मा - फोटो : डेमो
भगवती चरण वर्मा की साहित्यिक सक्रियता को तो सभी जानते हैं, लेकिन वह राजनीतिक तौर पर भी कम सजग नहीं थे। प्रसंग 1967 के लोकसभा चुनाव का है। कांग्रेस ने राजधानी के प्रसिद्ध उद्योगपति वीआर मोहन को प्रत्याशी घोषित किया। कॉफी हाउस में बैठने वालों ने तय किया कि लखनऊ में पूंजीपति को टिकट देने का विरोध होना चाहिए।
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भगवती चरण वर्मा - फोटो : डेमो
बिहार के राज्यपाल लालजी टंडन ने संस्मरण में लिखा है, ‘मोहन के खिलाफ साझा उम्मीदवार उतारने के लिए कॉफी हाउस में चर्चा हुई और नामों की खोजबीन हुई। सेवानिवृत्त न्यायाधीश आनंद नारायण मुुल्ला का नाम तय हुआ। आनंद नारायण मुल्ला ने काकोरी कांड में सरकारी वकील के रूप में काम किया था और रामप्रसाद बिस्मिल सहित अन्य क्रांतिकारियों के खिलाफ पैरवी की थी।
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भगवती चरण वर्मा - फोटो : डेमो
मैंने कहा, ‘क्रांतिकारियों का विरोध करने वाले वकील का समर्थन नहीं किया जाना चाहिए, पर वामपंथी दल मुल्ला के समर्थन पर ही अड़े रहे। तब मैंने सोचा किसी बडे़ साहित्यकार को उतारकर मुल्ला का विरोध किया जाए। अमृतलाल नागर, यशपाल और भगवतीचरण वर्मा ‘भगवती बाबू’ परस्पर गहरे मित्र थे।

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भगवती चरण वर्मा - फोटो : डेमो
मैंने प्रसिद्ध साहित्यकार अमृतलाल नागर से मुल्ला के विरोध में चुनाव लड़ने का आग्रह किया, पर नागर जी ने कहा, ‘मुझे नहीं भगवती बाबू को लड़ाओ।’
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भगवती चरण वर्मा - फोटो : डेमो
 मैंने भगवती बाबू से आग्रह किया। भगवती बाबू तैयार भी हो गए, पर पार्टी (जनसंघ) इस पर एकमत नहीं हो पाई और भगवती बाबू चुनाव लड़ते-लड़ते रह गए।’
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