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अच्छा लगता है जब लोग कहते हैं मैं पिता जैसी हूं, यहां पढ़ें फादर्स डे पर स्पेशल स्टोरीज

Sun, 16 Jun 2019 06:02 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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- फोटो : amar ujala
कभी हवा में उछालते थे, कभी करतब दिखाते थे। मेरी एक मुस्कान के लिए कभी हाथी कभी घोड़ा बन जाते थे। सो सकूं मैं पूरी रात चैन के साथ, इसलिए वे पूरी रात एक करवट में गुजारते थे...। यह अल्फाज सिर्फ मेरे या आपके नहीं, किसी लड़के या लड़की के नहीं बल्कि हर बेटे और बेटी के हैं, जिनके पास हैं पापा। या फिर उनके भी जिनके पिता इस दुनिया में तो नहीं, पर यादें, उनकी सीख उनका दिया बेफिक्र बचपन और बेलौस जवानी और सबसे बढ़कर एक ऐसी पहचान जिसने हमें सिर उठाकर दुनिया की चुनौतियों का सामना करने के लायक बनाया।

एक पिता की अहमियत उसकी परवरिश और उसकी दी जिंदगी को शब्दों में बांधना असंभव है। आज मौका भी है और दस्तूर भी कि हम उन्हें थैंक्स कहकर अपने जज्बात का इजहार कर सकें। एक बच्चे के जीवन में पिता का स्थान क्या है? यह बता रहे हैं कुछ ऐसे ही बेटे-बेटियां। हमारे साथ फादर्स डे का हिस्सा बनिए...।
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- फोटो : amar ujala
हमारी फिक्र में बढ़ाया हौसला, जीती जिंदगी से जंग
ऐसे पिता खुशनसीब को ही मिलते हैं, जो अपने बच्चों की खातिर मौत से लड़ जाएं। बात 1998 की है जब मैं 12 साल की थी। पिता डॉ. जेएन बुधवार को थैलीसीमिया था और बदकिस्मत से उनका एक्सीडेंट हो गया। थैलीसीमिया होने के कारण दुघर्टना के बाद उनके पूरे शरीर से खून बह रहा था। डॉक्टर भी परेशान थे, पर उन हालातों में भी पिता सिर्फ एक ही शब्द बोल रहे थे मुझे अभी जिंदा रहना है अपनी बेटियों के लिए। उनके इसी हौसले ने उन्हें जिदंगी दी और 7-8 माह बाद वह ठीक हो गए। परिवार में मां प्रमिला बुधवार के अलावा बड़ी बहन इंजीनियर हैं। वह अक्सर बाहर रहती हैं। मेरे पिता हमारी बैक बोन थे जिनके बगैर मेरा डॉक्टर बनने के सपना कभी पूरा नहीं हो पाता। हालांकि अब वो हमारे बीच नहीं हैं। - डॉ. निमिशा बुधवार (डॉ. निमिशा अपने पिता डॉ. जेएन बुधवार के साथ।)
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पिता ने दोहरी भूमिका में निभाया फर्ज
पिता का प्यार क्या होता है यह हमें तब पता चला जब मैने अपने पिता को दोहरी भूमिका में देखा। अगर वह पिता बनके डांटते थे तो अगले ही पल मां की भूमिका में हम सब भाई बहनों को गले लगाते थे। हालांकि मेरे वालिद शुरूआत में सख्त मिजाज के थे। मां के न रहने के बाद जैसे उनका व्यक्तित्व ही बदल गया। बड़ी बहन के अलावा मैं करीब 13-14 वर्ष का था। छोटी बहन 9-10 वर्ष की जब मां नहीं रहीं। पिता सरकारी नौकरी करते थे। परिवार में हम भाई बहनों के अलावा कोई और बड़ा नहीं था। इस हादसे के बाद से ही मेरे पिता ने दोनों जिम्मेदारियां अपने सिर ले लीं। स्कूल की तैयारी से लेकर मां का हर फर्ज उन्होंने बखूबी निभाया और आज भी निभा रहे हैं। आज हमारी पढ़ाई भी लगभग पूरी होने को है। - मो. अदनान, छात्र (मो. अदनान पिता के साथ।)

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- फोटो : amar ujala
अच्छा लगता है जब लोग कहते हैं मैं पिता की जैसी हूं
पिता प्रो. पूरन सिंह लखनऊ में ही डिग्री कॉलेज में प्रोफेसर थे। हमारे परिवार में तीन बहनें और एक भाई है। उस जमाने में जब लोग बेटों की ज्यादा तरजीह देते थे तब मेरे पिता ने बड़े भैया के साथ हम तीनों बहनों को भी बराबर की शिक्षा और स्थान दिलाया। मुझे उनके महत्व का एहसास उस दिन सबसे ज्यादा हुआ जब शादी के बाद मैं खुद पारिवारिक समस्याओं से गुजरी। मां के साथ का अंदाजा सबको होता है पर उस मौके पर मेरे पिता ने मां से भी बढ़कर मेरा सहयोग किया। उन्होंने पूरी जिंदगी मेरा ध्यान रखा। मेरे पिता खुली विचारधारा, शांत स्वभाव और सादगी पसंद व्यक्ति थे। अच्छा लगता है जब लोग मुझसे कहते हैं कि मैं अपने पापा की तरह हूं।
- प्रो. शर्मिला सिंह, प्रबंधक पायनियर मांटेसरी स्कूल (पिता पूरन सिंह के साथ प्रो. शर्मिला सिंह)
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मां के बाद, मां-पिता दोनों का फर्ज निभाया
जब मेरी मां का स्वर्गवास हुआ तब मैं छठवीं क्लास में थी। बड़ी बहन प्रीतिका 7वीं में थी। उन्हें हृदय रोग की समस्या थी। घर में पिता अशोक श्रीवास्तव और हम दोनों बहनों के अलावा कोई और नहीं था। मां के लाड़-प्यार में कभी हमने घर के किसी काम में रुचि नहीं ली। पिता बैंक में अकाउंटेंट थे, नौकरी के चलते हमारे लिए समय निकाल पाना आसान नहीं था। पर, मुझे अच्छे से याद है स्कूल की तैयारी से लेकर अपने हाथों खाना खिलाना तक उन्हें भाता था। उन्होंने दोस्त की तरह हमें समझाया। मस्ती करना हो या टीचर की तरह पढ़ाई करवाना। उन्होंने सभी भूमिकाएं अच्छे से निभाईं। उन्होंने हमें मां का भी प्यार दिया। मैं बैंक में जॉब करती हूं और बहन भी डिग्री कॉलेज में प्रोफेसर हैं। शादी के बाद भी हम हर वक्त उनके संपर्क में रहते हैं। मां के तरह उनसे अपनी जिंदगी की हर बात साझा करती हूं। - वर्तिका श्रीवास्तव, बैंक कर्मचारी विकासनगर (वर्तिका श्रीवास्तव अपने पिता अशोक श्रीवास्तव के साथ।)
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पिता के सिखाए मूल्यों ने सरल की जीवन की राह
स्कूल खोलकर गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देनी हो। इम्तिहान के समय बच्चों को घर में कमरे देकर पढ़ाना हो या अपने शिष्यों को आगे बढ़ाने का अथक प्रयास। पिता भद्रसेन सिंह ने पूरी जिंदगी गरीब बच्चों को शिक्षा देने में लगा दी। वह खुद एक छोटे से गांव में पले-बढ़े। उच्च शिक्षा हासिल कर उन्होंने गांव के स्कूल में पढ़ाना पसंद किया। इसके लिए उन्होंने गांव में विद्यार्थियों के लिए मुफ्त स्कूल खोला था। जहां वह खुद गरीबों को मुफ्त में पढ़ाते थे। परिवार में मां-पिता के अलावा दो भाई थे। पिता ने कभी हममें और गांव के बच्चों में फर्क नहीं किया। हम दोनों ने इंटर तक शिक्षा उसी स्कूल से हासिल की। भाई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी हुए तो मैं लविवि में प्रोफेसर। पिता का समर्पण ही हमारे लिए सीख बना। अब वह हमारे बीच नहीं हैं पर हम दोनों भाई मिलकर उनके द्वारा शुरू किए गए स्कूल को उसी तरह संचालित कर रहे हैं। - प्रो. ध्रुवसेन सिंह, जियोलॉजी विभाग लविवि (प्रो. ध्रुवसेन सिंह व पिता भद्रसेन सिंह।)

 
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पिता से मिली सच्चाई, साहस और ईमानदारी की सीख
वह बात मुझे अच्छे से याद है जब मैं दस साल का था। मेरे पायलट पिता कैप्टन पीपी टिक्कू के साथ एक अजब किस्सा हुआ। जैसे ही प्लेन टेक ऑफ किया उनकी नजर पैर के पास बैठे कोबरा पर गई। उन्होंने इमरजेंसी लैंडिंग की और कोबरा को बाहर निकाला, पर पिता ने उसे मारने नहीं दिया। इस पर मुझे अजीब लगा और मैंने उनसे सवाल किया। उन्होंने कहा कि सांप ने मुझे नहीं डसा। उसने मुझे दोस्त समझा और दोस्तों के साथ हमेशा ईमानदार रहना चाहिए। चाहे वह जहरीला सांप ही क्यों न हो? इसी तरह बचपन में जब भी हम बाइक चलाते और गिरते तब वह हमें कभी नहीं डांटते। उनका कहना था कि जीवन में कभी डरकर नहीं रहना चाहिए। सच्चाई, हिम्मत और ईमानदारी की उनकी सीख ने मेरी जिंदगी का नजरिया ही बदल दिया। हालांकि अब वो हमारे साथ नहीं हैं। परिवार में मां के अलावा तीन भाई हैं। दोनों भाई बिजनेस करते हैं।
- प्रो. एपी टिक्कू, एचओडी, कंजरवेटिव डेंटिस्ट्री एंड एंडोडांटिक्स विभाग, केजीएमयू (पिता पीपी टिक्कू के साथ प्रो. एपी टिक्कू।)
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