कुछ ऐसा ही है शिया धर्मगुरु मौलाना डॉ. कल्बे सादिक का दुनिया से रुखसत होना। उनकी मृत्यु बस एक इंसान का इंतकाल भर नहीं है बल्कि कई उन परंपराओं पर भी संकट छा जाना है जिनके वह बड़े पैरोकार थे। कारण, कोई दूसरा कल्बे सादिक लखनऊ में पैदा होना काफी मुश्किल जो दिखाई दे रहा है।
जो धर्मगुरु तो एक तबके का हो लेकिन सामाजिक सरोकारों व जिम्मेदारियों पर उसकी महारथ सभी को लुभाती हो। किसी को उसमें अपने लिए विरोध दिखता ही न हो। यूं तो दुनिया में आने वाले हर शख्स को एक दिन जाना होता है लेकिन कुछ ऐसे होते हैं, जिनका किसी वक्त भी जाना रुला देता है। यही लगता है कि अभी कुछ दिन और रुक जाते तो ठीक था।
ऐसे ही थे मौलाना डॉ. कल्बे सादिक। नाम के मुताबिक ही आलीशान शख्सियत। नफासत व नजाकत के इस नवाबी शहर में जब भी कोई संकट आया तो सभी की निगाहें उनकी तरफ गई कि सादिक साहब जरूर कुछ न कुछ हल निकालेंगे। उन्होंने निकाला भी। वह चाहे शिया-सुन्नी विवाद का मामला हो या हिंदू-मुसलमानों का।
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रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने की शिया धर्मगुरु मौलाना डॉ. कल्बे सादिक से मुलाकात (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला
क्या भूलें क्या याद करें
संवेदनशील मुद्दों पर बेबाक राय। असहमति के स्वर भी बुलंद करने में पीछे नहीं पर सलीके के साथ और संविधान के दायरे में। संवाद की बात हो तो किसी मंच को साझा करने से गुरेज नहीं। दुनिया के इस्लामी मुल्कों में ही एक विद्वान के नाते सम्मान नहीं बल्कि इंग्लैंड व अमेरिका जैसे देशों में उन्हें सुनने वालों की भीड़ जो इस्लामी देश नहीं है, उनकी शख्सियत का कद बताने को पर्याप्त है।
जिनकी पहचान इस्लाम के बड़े चेहरे के रूप में हो, उसके मेहमानों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक केसी सुदर्शन और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता भी रहे हों तो उस शख्सियत की गहराई समझी जा सकती है। एक नहीं अनेक प्रसंग हैं, जब उन्होंने विदेशों में भारत की तारीफ की। मामला चाहे पाकिस्तान से हो या चीन से। मौलाना हमेशा मुल्क के अव्वल नंबर के पैरोकार बनकर सामने आए।