साहित्य की हर विधा की अपनी खूबियां हैं और नाटकों को उनमें गूंथी हुई चरित्रों की द्वंद्वात्मकता और अंतर विरोध दूसरी विधाओं से अलग पहचान दिलाती है। किसी समय प्रसिद्ध फिल्मकार श्याम बेनेगल के पसंदीदा अभिनेता रहे, ‘सूरज का सातवां घोड़ा’, ‘मम्मो’, ‘सरदारी बेगम’ जैसी फिल्मों में यादगार भूमिका के बाद ‘व्योमकेश बख्शी’ के जरिये हर दिल अजीज बने रजित कपूर मंगलवार को रेपेटवा के मंच पर लेखक-निर्देशक और अभिनेता की भूमिका में नजर आए।
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रेपेटवा समारोह।
उम्मीद थी कि कोई यादगार प्रस्तुति देखने को मिलेगी, लेकिन नाटक ‘वन ऑन वन पार्ट टू’ में हास्य और चुटकुलेबाजी का ख्याल ही दिखा, एक नाटक के रूप में यह कोई प्रभाव नहीं छोड़ सका। संगीत नाटक अकादमी परिसर में चल रहे समारोह में गाडगे सभागार में मंचित नाटक आठ अलग-अलग कहानियों का कोलाज था। किसी में दैनिक जीवन की आपाधापी में फंसी हुई स्त्री थी तो किसी में ट्रेन का टीसी।
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रेपेटवा समारोह।
- फोटो : amar ujala
कोई कहानी डीजे की थी तो कोई फिल्म निर्माता की। एक कहानी सेना के जवानों पर थी, लेकिन ये कहानियां न कोई खास प्रभाव छोड़ पाईं और न ही इनमें काम कर रहे अभिनेताओं के अभिनय। ज्यादातर कहानियों में एकल प्रलाप और हास्य था। किसी दर्शक ने इन पर ठीक ही टिप्पणी की कि ऐसा लग रहा है जैसे हम नाटक नहीं स्टैंड अप कॉमेडी देख रहे हैं।
अंग्रेजी और हिंदी में दो घंटे से अधिक लंबा यह नाटक कहानी और अभिनय के खास प्रभाव न होने के कारण बोझिल भी हो गया। ज्यादातर कहानियों की प्रस्तुति एकल थीं। प्रस्तुति में रजित कपूर के अतिरिक्त सुमित व्यास, अनु मेनन, बृजेश हिरजी, गगनदेव रायर, नेल भूपालन, शिखा तलसानिया ने भाग लिया।