जिला प्रशासन, संबंधित विभाग और सामाजिक संस्थानों की सारी कवायदें और दावें पीछे रह गए। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च (आईआईटीआर) की प्री-मानसून रिपोर्ट-2018 के मुताबिक ध्वनि प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। पिछले चार साल से यही हालात है और इसका सीधा असर हमारी जिंदगी पर पड़ रहा है। डिप्रेशन, हाइपरटेंशन और चिड़चिड़ापन लखनऊ के लोगों को अपनी गिरफ्त में लेता जा रहा है। यदि हम अभी भी नहीं चेते तो हालात और भी बदतर हो सकते हैं।
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आवासीय में व्यावसायिक उपयोग तो वजह नहीं?
आईआईटीआर के वैज्ञानिकों का कहना है कि 2018 में भी आवासीय इलाकों में ध्वनि प्रदूषण दिन के समय 67 से 79.8 डेसीबल के बीच रिकॉर्ड हुआ। रात में यह 54 से 62.7 डेसीबल के बीच रहा। अनुमन्य सीमा का मानक ही दिन के समय 55 और रात में 45 डेसीबल रिहाइशी इलाकों में है। आशंका जताई जा रही है कि आवासीय इलाकों में तेजी से बढ़ रही व्यावसायिक गतिविधियां इसकी वजह हो सकती हैं। देर रात तक होटल-रेस्त्रां में डीजे के साथ बाजार में वाहनों की आवाजाही और मशीनों का उपयोग इसका कारण हो सकता है।
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वाहनों की बढ़ती संख्या बिगाड़ रही हालात
व्यावसायिक इलाकों में दिन के समय ध्वनि प्रदूषण 76.2 से 83.4 डेसीबल के बीच रिकॉर्ड हुआ है। रात में यह 56.2 से 68.7 डेसीबल के बीच था। व्यावसायिक क्षेत्र में अनुमन्य सीमा का मानक ही दिन के समय 65 और रात में 55 डेसीबल होता है। शहर में वाहनों की संख्या 20 लाख के ऊपर पहुंच चुकी है। ऐसे में हर दो व्यक्ति के बीच एक वाहन मौजूद है। शहर में लगने वाला लगातार जाम और वाहनों में उपयोग हो रहे प्रेशर हार्न को इसका कारण बताया जा रहा है।
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औद्योगिक क्षेत्र में भी सिर्फ रात में राहत
औद्योगिक क्षेत्रों की हालत देखें तो सिर्फ रात में ही अनुमन्य मानक 70 डेसीबल से कम ध्वनि प्रदूषण रिकॉर्ड हो रहा है। हालांकि, आईआईटीआर की रिपोर्ट में औसत आंकड़ा 69.5 यानी अनुमन्य सीमा से मामूली सा ही कम मिला है। इसकी वजह यह हो सकती है कि रात के समय उद्योगों में लखनऊ में काम बहुत कम होता है। उधर, दिन में मानक 75 से अधिक 80.1 डेसीबल ध्वनि प्रदूषण रिकॉर्ड किया गया।
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बहरा और चिड़चिड़ा बना देगा शोर
आईआईटीआर के एनवायरमेंट डिवीजन के एचओडी डॉ. एससी बर्मन के मुताबिक, लंबे समय तक ध्वनि प्रदूषण मानक से अधिक बना रहा तो बहरेपन की समस्या हो सकती है। वहीं, लोगों में चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है। आने वाले समय में यह डिप्रेशन, हाइपरटेंशन जैसी खतरनाक बीमारियों की भी वजह बन सकता है।
नियंत्रण करने के लिए कर रहे प्रयास
हम कोशिश कर रहे हैं कि ध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण किया जाए। इसके लिए योजना बनाकर काम करना होगा। वाहनों की सड़क पर संख्या कम करने से लेकर नो हॉर्न जोन भी बनाने होंगे। आवासीय में व्यावसायिक उपयोग रोेके जाने की जरूरत है। इससे भी हालात बेहतर होंगे। - डॉ. रामकरन, क्षेत्रीय अधिकारी, यूपीपीसीबी