जी, हां...। भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच कैसे बनाएं दोस्त, कैसे निभाएं रिश्ते और दोस्ती...। इसका रास्ता लखनऊ की लेडीज ने निकाल लिया है। बहाना तो है कॉफी का, लेकिन वे जुटती हैं कुछ समय दोस्तों के साथ बिताने को। कुछ उनकी सुनती हैं, कुछ अपनी सुनाती हैं। चिट-चैट होती है, मगर गॉशिप्स से वे दूर रहती हैं। एक खास बात कि ये सभी किटी पार्टी के ट्रेंड को बदलना चाहती है, इसीलिए कॉफी मीट का आयोजन करती हैं। हालांकि वे किटी पार्टी को बुरा नहीं मानती, लेकिन इसका हिस्सा बनने से उन्हें एतराज है। मिलने-मिलाने के नए ट्रेंड कॉफी मीट के बारे में अमर उजाला की रिपोर्ट....।
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निधिका गोयल
- फोटो : अमर उजाला
...क्योंकि हमें मिलना-मिलाना पसंद है
हमें लोगों से मिलना पसंद है और बहुत सारे दोस्त बनाना चाहती हूं। दरअसल जिंदगी में ठहराव नहीं आना चाहिए। कॉफी मीट इसी ठहराव को दूर कर पॉजीटिव एनर्जी देती है। हमारे ग्रुप में डॉक्टर भी हैं, लॉयर और इंजीनियर भी हैं। जब सब साथ बैठते हैं किसी भी विषय पर गहरा मंथन होता है। एक -दूसरे से बात करने पर निगेटिव इमेज टूटती है। जब हम लखनऊ रहने आए तो किटी जॉइन की थी, यहीं कई फ्रें ड्स बने, लेकिन किटी का ट्रेंड समझ नहीं आया। कॉफी मीट में समाज के हर वर्ग के लोग हैं, जिनके सुझाव भी अहम हैं। - निधिका गोयल
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कॉफी मीट विद फ्रेंड्स
- फोटो : अमर उजाला
अपने लिए मिलता है स्पेस
हमारे ग्रुप में 6-12 लोग तक होते हैं। महीने में एक बार होती है कॉफी मीट। दरअसल, किटी पार्टी में हर एज ग्रुप के लोग होते हैं। हमारे से बड़ी उम्र की महिलाओं के सामने हम बंदिश भी महसूस करते थे। दूसरा किटी में लंच होता। कई बार ऐसा होता कि हम डायटिंग पर हैं, ऐसे में दोपहर का खाना खाने की अनिवार्यता मुश्किल पैदा करती थी। एक समय के बाद जबरदस्ती के बंधन ठीक नहीं लगते। कॉफी मीट में जब हम समान एज ग्रुप, समान सोच के लोग मिलते हैं तो अपने लिए स्पेस मिलता है। कॉफी के साथ हल्का स्नैक्स और चिट-चैट फिर अपने-अपने घर। - दीप्ति अग्रवाल
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अंबिका गुप्ता
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दोस्त और कॉफी बनाएं तरोताजा
किटी का हिस्सा वे ही बन सकते हैं जो तीन-चार घंटे और कभी-कभी अधिक वक्त भी दे सकें। हमने तय किया कि हम कॉफी पर मिलेंगे। शाम को चार-पांच बजे चाय का टाइम भी होता है। कहीं भी मिल लेते हैं। नौ से दस लोग होते हैं। गॉशिप्स एकदम नहीं। स्टोरीटेलिंग के साथ-साथ सामान्य विषयों पर चर्चा करते हैं। हमारी मीट 15 दिन या एक महीने में एक बार जरूर होती है। इसके लिए कोई भी कैफे हो सकता है या फिर कहीं महोत्सव चल रहा है तो हम वहीं मिलना तय कर लेते हैं। लोहिया पार्क में वॉक के दौरान सब जुट जाते हैं और वहीं कुछ वक्त साथ में बिता लेते हैं। - अंबिका गुप्ता
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डॉ ज्योतसना
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‘ब्रेन वेंटीलेशन’ का एक जरिया
हम किटी को बुरा नहीं कहते। एक लंबे समय तक हम खुद किटी पार्टी से जुड़े थे। जैसे-जैसे प्रोफेशन लाइफ की व्यस्तता बढ़ती गई, किटी के लिए समय कम होता गया। दरअसल, उसके लिए लंच की व्यवस्था करना, पैसे जमा करना, नहीं कर पाए तो दूसरे मेंबर के घर तक पहुंचना और ढेर सारा गॉशिप्स। समय के साथ-साथ ये सब चीजें परेशान करने लगीं और छूट गई किटी पार्टी। इसी के साथ दोस्तों का साथ भी। अब हमने कॉफी मीट शुरू की, जो महीने-15 दिन में करते हैं। इसमें हम मिलते हैं, काफी पीते है, कुछ खाना हुआ तो हल्का ले लेते हैं। जगह कोई तय नहीं, कहीं भी जहां सब आसानी से पहुंच जाएं। कई बार वॉक पर भी हो जाती है कॉफी मीट। मेरी समझ से ये ‘ब्रेन वेंटीलेशन’ का एक जरिया है। - डॉ. ज्योत्सना मेहता
मजबूत होती है बॉन्डिंग
हमारे कई कॉफी ग्रुप्स हैं। हफ्ते में एक बार एक ग्रुप के साथ तो मीट हो ही जाती हैं। सच कहूं तो लेडीज को मिलते-जुलते रहना चाहिए। जरूरी नहीं है कि मिलने की कोई वजह है। मुलाकातों से एक पॉजीटीविटी आती है। दूसरी सबसे बड़ी बात कि कॉफी मीट में हम हर तरह की फॉर्मेलिटी से फ्री होते हैं। न लंच की मजबूरी न पैसों का कोई हिसाब किताब। बस मिलना-मिलाना, क्योंकि दोस्तों का साथ आपको तनाव मुक्त तो करता ही है। हम सब की लाइफ स्ट्रेस फुल है, जिसे कम भी करती है। - डॉ. मधुमिता बोस