नाना जी देशमुख राष्ट्रीय स्वयंसेवक के उन प्रचारकों में थे जो व्यावहारिक दृष्टि रखते थे। शायद इसी वजह से संघ के प्रचारक उनसे बेझिझक अपनी सारी बात कह देते थे। बात 1950 की है जब संघ प्रचारक कृष्णकांत गोरखपुर में नियुक्त थे।
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नानाजी देशमुख
- फोटो : डेमो
उनकी इच्छा थी कि वह गृहस्थ जीवन में प्रवेश करें। नाना जी देशमुख पर लिखी पुस्तक राष्ट्रऋषि नाना जी से पता चलता है, 'कृष्णकांत काफी उलझन में थे किससे कहें जो उनका भाव समझे और हंसी भी न उड़ाए।
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नानाजी देशमुख
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आखिरकार कृष्णकांत लखनऊ आए और नाना जी से मुलाकात कर कहा, 'विवाह करना चाहता हूं। नाना जी ने पूछा, 'विवाह करना तो ठीक है। पर, जीविकोपार्जन का साधन क्या होगा? कृष्णकांत चुप रह गए। क्या कहते। वह भी इसी समस्या के नाते विवाह करने से हिचक रहे थे।
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नानाजी देशमुख
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नाना जी ने कहा, 'जाओ! मैं विचार करके बताऊँगा। इसके बाद नाना जी ने संघ के अन्य वरिष्ठ पदाधिकारियों से बातचीत की और शिशु मंदिर की कल्पना बनाई। जिससे कृष्णकांत ही नहीं उनके जैसे अन्य प्रचारकों की भी मदद हो सके।
उन्होंने कृष्णकांत का विवाह कराया और वहीं पर शिशु मंदिर की घोषणा की। जिससे कृष्णकांत जैसे दंपतियों की शिक्षा और संस्कारों का उपयोग भावी पीढ़ी के निर्माण में हो सके। इस तरह 1950 में पहला शिशु मंदिर खुला। जिसकी आज हजारों श्रृंखला देश भर में हैं।'