चार साल पहले लापता हुए गोलू को उसके पिता दिनेश ने देखा तो पहचान ही नहीं पाए। कानपुर में साइकिल असेंबलिंग का काम करने वाले दिनेश का बेटा 12 साल की उम्र में लापता हो गया था। गोलू ने बताया कि उसे एक ट्रक वाला अपने साथ जबरन ले गया था, जब उसने ज्यादा विरोध किया तो लखनऊ के आगे किसी गांव में छोड़ दिया, जहां उसे बंधक की तरह रखकर घरेलू काम करवाए जाते थे। एक रोज वह वहां से भाग निकला और वाराणसी पहुंचा। वहां कुछ समय राजकीय बालगृह में रहा। काउंसलिंग के दौरान उसने अपने घर का पता बताया, जिसके बाद बुधवार को उसे पिता को सौंप दिया गया।
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लखनऊ में एक स्वयंसेवी संस्था ने बुधवार को गोलू और उसके जैसे 60 बच्चों को उनके अभिभावकों को सौंपा। इनमें से अधिकतर बच्चे किसी न किसी वजह से अपने घरों से भागकर मुंबई, दिल्ली, जयपुर पहुंच गए थे। वहां कोई मेहनत-मजदूरी तो कोई भीख मांगकर गुजारा कर रहा था। इसी दौरान खुशकिस्मती से उन्हें स्वयंसेवी संस्थाओं के जरिए बालगृहों में भेजा गया। वहां से जब उनके राज्यों की जानकारी हुई तो उन्हें वहां भेज दिया गया। बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, महाराष्ट्र आदि राज्यों से लखनऊ लाए गए ऐसे ही 60 बच्चों को जब उनके अभिभावकों को सौंपा गया तो उनके चेहरों पर मुस्कान खिल उठी।
(बच्चों से मिलतीं कैबिनेट मंत्री रीता बहुगुणा जोशी)
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राज्य स्तर पर होगी निगरानी
गोमतीनगर स्थित बौद्ध संस्थान में साथी संस्था की ओर से आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि महिला एवं बाल कल्याण मंत्री रीता बहुगुणा जोशी ने बताया कि राज्य स्तर पर यूपी के सभी बालगृहों, संप्रेक्षण गृहों और महिला शरणालयों की सीसीटीवी कैमरे से निगरानी रखी जाएगी। उन्हाेंने इन गृहों की सुरक्षा व्यवस्था सुधारने की जरूरत जताई। कार्यक्रम में समन्वयक मोहम्मद अबरार सहित कानपुर, लखनऊ व वाराणसी की बाल कल्याण समितियों के अधिकारी व महिला एवं बाल कल्याण विभाग के अधिकारी मौजूद रहे।
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सात साल बाद मिला कलेजा का टुकड़ा
इन बच्चों में 14 साल का दया भी शामिल था। मूलत: जौनपुर के मेढ़ा के रहने वाले और मुंबई में काम कर रहे उसके माता-पिता में सात साल पहले अलगाव हुआ जिसके बाद पिता गांव लौट आए। 2013 में मां की मौत हो गई। इसके बाद दया के बुरे दिन शुरू हो गए, वह पिता से संपर्क नहीं कर सका। पिता भी उसे तलाश नहीं पाए। वह सड़कों पर घूमता, भीख मांगकर खाता। इस तरह दो साल बीत गए। अंतत: उसे बालगृह लाया गया, जहां काउंसलिंग के दौरान उसे अपने गांव का नाम याद आया, जिसके आधार पर उसके घर की तलाश हो सकी। दया का नौ साल का दिव्यांग भाई आज भी मुंबई के बालगृह में है। उसके पिता राम आसरे बताते हैं कि वे जल्द ही छोटे बेटे को भी लेकर आएंगे।
जब उम्मीद टूट चुकी थी, तब मिला अनूप
जौनपुर के ही कटहन गांव के अनूप मिश्रा के पिता अनूप के दो साल का होने के पहले ही चल बसे थे। मां को कैंसर था, जिनके इलाज के लिए वे मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल जाते। ऐसी ही एक यात्रा के दौरान चार साल पहले अनूप लापता हो गया। अनूप मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ नहीं था। उसकी मां और चाचाओं ने सभी प्रयास किए, लेकिन चार साल बाद भी कुछ पता नहीं चला। वे अनूप के मिलने की उम्मीद खो चुके थे। दूसरी ओर अनूप को लावारिस पाकर मुंबई के बालगृह में रखा गया, जहां उसके द्वारा बताई गई जानकारियों के अनुसार उसे वाराणसी के बालगृह में भेजा गया। वाराणसी के संप्रेक्षण गृह में फसाद होने पर वहां के कुछ बच्चों को बालगृह में भेज दिया गया। इन्हीं में से एक बच्चा अनूप के गांव का था, जिसने उसे पहचाना और घर वापसी करवाई।