लखनऊ की विरासत और पहचान पर हमला उन्हें तिलमिलाकर रख देता था । मायावती से मुंहबोले बहन-भाई का रिश्ता होते हुए भी जब तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में बसपा नेता ने यहां पेरियार की मूर्ति लगाने की घोषणा की तो टंडन ने उसका खुलकर विरोध किया । कहा कि पेरिराार की मूर्ति हमारी भावनाओं पर चोट है । लक्ष्मण नगरी में राम का विरोध करने वाले पेरियार की मूर्ति नहीं लग सकती। वह बेबाकी से कहते थे कि लखनऊ को राम के अनुज लक्ष्मण ने ही बसाया था। इसीलिए वह उन लोगों पर बरबस नाराज भी हो जाते थे जो लखनऊ का इतिहास चंद इमारतों और नवाबों तक देखते थे । इसीलिए अखिलेश सरकार में जब लक्ष्मण टीला कहे जाने वाले स्थान पर टीले वाली मस्जिद का बोर्ड लगाया गया तब भी उन्होंने सख्त आपत्ति उठाते हुए कहा कि पर्यटन के बहाने ही सही लेकिन लखनऊ के इतिहास अनुचित छेड़छाड़ की जा रही है। जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
वह कहते थे कि लखनऊ का इतिहास सिर्फ नवाबों, इमारतों और बेगमों तक सीमित नहीं है । इससे बहुत पुराना है । बावजूद इसके लखनऊ के बड़े मुस्लिम धर्मगुरुओं के साथ उनका सहज संवाद और घनिषठता लोगों को धोखे में डाल देती थी । पर, बात अगर राजनीति, संस्कृति और धर्म पर आ गई तो सामने वाले को अपने तार्किक बातों से चुप करने में भी वह पीछे नहीं थे । रामभद्राचार्य जैसे बड़े संतों के साथ भी उनका स्वाभाविक सानिध्य रहा तो स्व. रामचंद्र परमहंस और गोरखपीठ के दिवंगत महंत अवैद्यनाध से भी उनका सहज रिश्ता रहा। प्रदेश में जब भाजपा की सरकार बनी और उसमें टंडन मंत्री बने तो उन्होंने पूरे देश में हर साल सुर्खियां बटोरने वाले राजधानी के कई दशक पुराने उस शिया-सुन्नी विवाद का सर्वमान्य समाधान कराकर लखनऊ में स्थाई शांति का रास्ता खोला। नहीं तो इससे पहले यही विवाद लखनऊ में प्रतिवर्ष खूनखराबा और कर्फ्यू की वजह बनता था ।
सबके लिए खुले द्वार
सांसद रहे या राज्यपाल लेकिन उन्हें जो मजा लखनऊ की महफिल में आता था वह कहीं नहीं आया । जिसे वह जब-तब जाहिर भी कर देते थे । 'मेरो मन अनत कहां सुख पावै, जैसे उड़ जहाज को पंछी फिर जहाज पर आवे।' लखनऊ के पत्रकारों का उनके साथ रिश्ता अद्भुत था । बड़े नेता थे तो मीडिया के निशाने पर जब-तब आ ही जाते थे । उस पर झल्लाते भी थे लेकिन जैसे ही खबर लिखने वाला दिखाई दिया तो मानों उन्हें याद ही नहीं रहता था कि उनके खिलाफ क्या छपा है, घर के मुखिया की तरह हंसते हुए सिर्फ यह कहना, 'जनाब आए हैं लाओ भाई कुछ बढ़िया चीजें खिलाओ ' माहौल को हल्का बना देता था।
पार्टी के भीतर भी और बाहर भी राजनीति में कभी-कभार कुछ तल्खियां हो ही जाती थीं लेकिन वह भी कुछ देर को । पत्रकार हों या राजनेता, साहित्यकार हो या संस्कृति कर्मी, अपनी विचारधारा का व्यक्ति हो या विरोधी लेकिन उनके दरवाजे सभी के लिए हमेशा खुले रहते थे । बड़े नेता रहे मंत्री रहे लेकिन रात 12-1 बजे भी उनसे फोन पर बात करने में कभी दिक्कत नहीं आई । बेतकुल्फी इतनी कि कोई उनसे चाट की दावत मांगता तो कोई कुल्फी, ठंडाई व आम की।
वह भी पीछे नहीं रहते उल्टे यदि किसी ने लंबे समय तक उनसे बात नहीं की तो वह खुद ही उससे चाट, कुल्फी व ठंडाई की दावत दे देते । उनकी मेजबानी का जवाब नहीं था। भाजपा या संघ के अब तक शीर्ष नेताओं में ही नहीं दूसरे दलों के प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं में गिनती के ऐसे लोग होंगे जिन्हें टंडन का मेहमान बनने का मौका न मिला हो । मंत्री रहे, सांसद रहे या राज्यपाल लेकिन उनसे मिलना कभी मुश्किल नहीं रहा । लोगों को मालूम था कि वह अगर लखनऊ में हैं तो शाम को हजरतगंज वाले ठिकाने पर जरूर मिलेंगे । जहां न कोई रोक होगी और न कोई टोकने वाला।
लालजी टंडन- पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी(फाइल फोटो)
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बतौर नगर विकास मंत्री उन्होंने लखनऊ के स्वरूप को बदला । पुराने लखनऊ की पतली गलियों की जगह चौड़ी और साफ सड़कें बनवाई। तालाबों का सुंदरीकरण और चौराहों को सुव्यवस्शित करने का काम किया । पुराने लखनऊ में ही नहीं प्रदेश के सभी नगरों में सीवर लाइन डलवा तक हाथ से मैला उठाने की परिपाटी पर विराम लगाने की दिशा में काम किया । पुराने कुओं (इंदारा कुआं) को साफ कराकर उनमें मोटर लगवाकर लोगों की पेयजल की कमी दूर करने का अभिनव प्रयोग किया।
यह सही है कि उनके लिए कई काम बतौर तत्कालीन सांसद अटल बिहारी वाजपेयी के कारण आसान हो गए थे लेकिन बड़ी संख्या में ओवरब्रिज का निर्माण, शहर से गंदगी दूर करने के लिए कालोनियों व मोहल्लों में डेयरियों को बाहर करने जैसे चुनौतीपूर्ण काम को उन्होंने जिस तरह बखूबी अंजाम दिया उसे भुलाया नहीं जा सकता । राजधानी होने के बावजूद शहर में कोई बड़ा सभागार न होने की टीस ने उन्हें कन्वेंशन सेंटर जैसे भवन के निर्माण का संकल्प दिलाया ही नहीं बल्कि तमाम बाधाओं के बावजूद पूरा भी कराया।
लोगों को वैवाहिक समारोह या अन्य कार्यक्रम करने के लिए कल्याण मंडप के रूप में सस्ती दर पर सभी जरूरी सुविधाओं से युक्त जगह उपलब्ध कराने की कल्पना भी टंडन की ही थी । बतौर आवास मंत्री उन्होंने 5, 10 और 15 रुपये प्रतिदिन के भुगतान पर गरीबों को शहरों में आवास मुहैया कराने का सफल प्रयोग कर दिखाया । जिसकी सराहना हुई और दूसरे राज्यों ने भी उनका अनुसरण किया । उन्होंने गोमती की सफाई का बीड़ा ही नहीं उठाया बल्कि खुद इस काम में अग्रिम मोर्चे पर डटे रहते थे । शहर को साफ करने के लिए नालों का डाइवर्जन जैसे काम करके उन्होंने अपनी दूरदर्शिता साबित की । कल्याण सिंह सरकार में ऊर्जा मंत्री बने तो उन्होंने सबसे पहले प्रदेश में बिजली संकट से निजात को उस समय वर्षों से अटके 'अनपरा-बी' पावर हाउस को पूरा कराया।
लालजी टंडन के पौत्र का विवाह।(फाइल फोटो)
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छोटी उम्र से ही सामाजिक सरोकारों में रुचि लेने वाले टंडन के रिश्तों को परिभाषित करना आसान नहीं था । नजदीकी लोगों में कुछ के उन्हें प्रतिष्ठा पर चोट करने वाले फैसले भी झेलने पड़े । जिन मायावती को उन्होंने भाजपा का समर्थन दिलाकर मुख्यमंत्री बनाया और राखी बांध बहन का भी दर्जा दिया उन्होंने ही एक दिन अचानक उनके करीबी अधिकारियों को रातोंरात लखनऊ से हटाकर उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाने की कोशिश की ।
इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ जेपी आंदोलन में भी बढ़-चढकर हिस्सा ही नहीं लिया बल्कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने उन्हें भाई महावीर के साथ समग्र क्रांति आंदोलन का उत्तर प्रदेश का सहसंयोजक बनाया । पर, आपातकाल के बाद जब चुनाव की नौबत आई और जीत तय थी तो उन हेमवती नंदन बहुगुणा ने ही उनका टिकट कटवा दिया जिनके साथ उनके घनिष्ठ रिश्ते माने जाते थे । टिकट कटवाने के बाद बहुगुणा टंडन के यहां खेद प्रगट करने आए तो टंडन ने कोई शिकायत नहीं की।
टंडन के राजनीतिक जीवन में आरोप-प्रत्यारोप के दौर भी चले । उनके विपक्षी नेताओं से मधुर रिश्तों पर भी टीका-टिप्पणियां हुई । लखनऊ नगर निगम के महापौरों डॉ. दाऊ जी गुप्त, डॉ. पी.डी. कपूर और अखिलेश दास से रिश्ते अपनों व गैरों की टीका-टिप्पणी का मुद्दा भी बने । पर, टंडन ने हर बार सिर्फ मुस्कराकर टाल दिया ।
संकल्प से सिद्धि तक
आम नेताओं से अलग व्यापारी शैली में धोती-कुर्ता पहनने वाले टंडन देखने में जितना सरल थे उतना ही संकल्पों को लेकर दृढ़ रहने वाले थे । जनसंघ और भाजपा के हर महत्वपूर्ण पड़ाव के वह नजदीकी गवाह रहे । भाजपा के स्थापना के तुरंत बाद जब पहली राष्ट्रीय कार्यसमिति की जगह तय होने का समय आया तो उन्होंने लखनऊ का नाम आगे कर दिया । साथ ही यहां गोमती होटल में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति की भव्य बैठक कराकर नेतृत्व को अपनी सांगठनिक क्षमता का परिचय दे दिया।