अंतरराष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव में देश-विदेश से जुटी महिला वैज्ञानिकों ने अपने संघर्ष, सफलता व उपलब्धियों के अनेक रोचक और प्रेरक किस्से साझा किये हैं। कई ने उस पल को भी याद किया, जब वह 40 पुरुष वैज्ञानिकों की भीड़ में अकेली थीं। पर उन्हें उम्मीद है महिला व पुरुष वैज्ञानिकों के बीच का यह अंतर धीरे-धीरे ही सही पर मिटेगा जरूर। उन्हें विश्वास है कि देश को मजबूत बनाने में महिला वैज्ञानिकों की अहम भूमिका होगी। इस दौरान प्रदेश भर से आई महिलाएं व छात्राएं तन्मयता से उनकी हर एक बात सुनती रहीं। कई बच्चियों ने सवाल भी किए। मंच से इन वैज्ञानिकों के नीचे आते ही छात्राएं उन्हें शुक्रिया अदा करती दिखीं। पेश है महिला वैज्ञानिकों की कहानी, उनकी जुबानी...
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प्रो. इंदिरा घोष
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बुरी चीज आसान और अच्छी चीज होती है कठिन
मैं हरियाणा में पैदा हुई। मेरे जन्म के वक्त क्या माहौल रहा होगा, मुझे पता नहीं। मेरा पालन-पोषण परंपरागत संयुक्त परिवार में हुआ। हर परिवार की तरह मेरे परिवार में भी सिर्फ बेटों की चाहत थी। मेरे भी दो भाई हैं, पर मेरी जिंदगी बिंदास थी। मेरे साथ मेरी दादी थीं, वही मेरी आदर्श हैं। उसकी यह बात हमेशा याद रहती है कि बुरी चीज आसान और अच्छी चीज हमेशा कठिन होती होती है। यही मैं सबको बताती हूं। मैं चाहती हूं कि शिक्षक रोजमर्रा की घटनाओं को विज्ञान से जोड़कर समझाएं। तभी बच्चों में उत्सुकता पैदा होगी और साइंस फन हो जाएगा। अरविंद गुप्ता का साइंस टॉय विज्ञान को मजेदार बनाने का बेहतरीन उदाहरण है। -प्रो. इंदिरा घोष, पूर्व डीन, स्कूल ऑफ कम्प्यूटेशनल एंड इंटरग्रेटिव साइंस, जेएनयू, नई दिल्ली
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डॉ सुचित्रा बनर्जी
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‘जुगाड़’ विद्या में माहिर होती हैं महिलाएं
महिलाएं चुटकी में घर की किसी समस्याओं का समाधान निकाल लेती हैं। उनकी इसी क्षमता को मैं ‘इमोशनल कौशिएंट’ यानी ‘जुगाड़’ कहती हूं। मेरा बच्चा जब छोटा था और घर में अकेली होती थी, तब खाना बनाने के समय उसे एक खाली टब में खिलौनों के साथ छोड़ देती थी। इससे मेरा काम आसानी से हो जाता था। इसी तरह हर घर में महिलाएं जुगाड़ से अपना काम बना लेती हैं। ऐसे में महिलाएं किसी भी फील्ड में कुछ भी कर सकती हैं। मैं आज के बच्चों से यही कहूंगी कि जो काम आप कर रहे हैं, उससे प्यार कीजिए और मन से कीजिए। जिस दिन काम बोझ बन जाएगा, फिर वह काम नहीं होगा। आप अपनी जिंदगी की प्राथमिकता खुद तय करें। -डॉ. सुचित्रा बनर्जी, वरिष्ठ वैज्ञानिक, नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (नासी), सीएसआईआर-सीमैप, लखनऊ
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डॉ अनुपम एस
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तेल के सूख चुके कुएं से फिर निकलेगा तेल
डीजल-पेट्रोल की बढ़ती कीमत के बीच युवा वैज्ञानिक डॉ. अनुपमा एस इंजीनियर का प्रोजेक्ट राहत देने जैसा है। वह बताती हैं कि देश में तेल के जो कुएं सूख गए हैं, उनसे भी तेल निकालने की कवायद में उनकी टीम जुटी है। इसके लिए उनकी टीम ऐसे माइक्रो आर्गेनिज्म विकसित करने में जुटी है, जिनके विकसित होने पर गैस या दूसरे तत्व पैदा होंगे, जिससे तेल ऊपर आ जाएगा। -डॉ. अनुपमा एस. इंजीनियर, माइक्रोबायोलॉजिस्ट
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प्रो. चंद्रिमा साहा
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पापा नहीं पढ़ सके थे विज्ञान, मुझे बना दिया वैज्ञानिक
घर के हालात ऐसे नहीं थे कि पापा विज्ञान की पढ़ाई कर सकते थे। मगर उन्होंने यह ठान लिया था कि बेटी की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने देंगे। मेरे पिता शंभू साहा पश्चिम बंगाल के मशहूर फोटोग्राफर थे। उनका साथ मिला और मैं वैज्ञानिक बन गई। फिर भी यह कहूंगी कि विज्ञान वही पढ़ेगा, जिसकी इसमें रुचि होगी और उसे जानने की भूख होगी। इसमें टीचर्स और साइंटिस्ट की भूमिका बेहतर हो सकती है।
-प्रो. चंद्रिमा साहा, पूर्व निदेशक, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इम्यूनोलॉजी
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प्रो. वीना टंडन
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‘महिलाएं मजबूत होंगी तो देश आगे बढ़ेगा’
महिलाओं की नई पीढ़ी देश को आगे बढ़ाने को तैयार है। भारत सदियों से साइंस में रोल मॉडल रहा है। देश की पहली माहिला डॉक्टर आनंदीबाई जोशी लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत रही हैं। मेरा मानना है कि हालत चाहे जैसे भी हों, महिलाएं आगे बढ़ने का रास्ता ढूंढ़ लेती हैं। -प्रो. वीना टंडन, नासी सीनियर साइंटिस्ट प्लेटिनम जुबली फेलो
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डॉ केशानी
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वैज्ञानिक बनने के लिए नॉलेज की भूख जरूरी
मुझे लगता है कि महिलाएं पहले से ही पुरुषों से काफी आगे हैं। वैज्ञानिक होने के लिए सबसे पहले थिंकर होना चाहिए, वहीं जब तक नॉलेज की भूख नहीं होगी तो रास्ता मुश्किल हो जाएगा। हर रोज नया काम, इनोवेशन जैसी बेसिक चीजें होनी जरूरी हैं। इस काम में साइंस फिक्शन मददगार हो सकता है। -डॉ. केशानी, असिस्टेंट माइक्रोबायोलॉजिस्ट, लुधियाना
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डॉ जुगनू जैन
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भारतीयों का बना रही कैंसर ट्यूमर के सैंपल का बैंक
मैं बोस्टन में जिस फार्मास्यूटिकल कंपनी के लिए काम कर रही थी वह कैंसर मरीजों के ट्यूमर का सैंपल कलेक्ट कर शोध करती थी। बतौर शोधकर्ता मैं खुद इसी काम में बिजी थी। हमारा काम मरीजों के ट्यूमर सैंपल पर दवाओं के असर का पता लगाना था। धीरे-धीरे मुझे लगा कि भारत में क्या इस तरह का काम हो रहा है इसका पता लगाना चाहिए। जब मैंने भारत के बारे में पता किया तो मालूम हुआ कि ऐसा काम बहुत सीमित था। मैं खुद अपनी कंपनी सेपियन बायोसाइंसेज बनाकर भारत में संभावना तलाशने लगी। अब मैं 2012 से अपोलो अस्पताल के साथ मिलकर काम कर रही हूं। यह अस्पताल इंडिया से कैंसर मरीजों के ट्यृूमर का सैंपल भेजता है और हम इस पर शोध करते हैं। भविष्य में यह कैंसर के इलाज में मील का पत्थर साबित होगा। - डॉ. जुगनू जैन, सीईओ, सेपियन बायोसाइंसेज
मेरे पापा को कैंसर है। उनका इलाज चल रहा है। मैं ऐसे प्रोजेक्ट पर काम कर रही हूं, जिसमें मरीज को दवा के साइड इफेक्ट से बचाया जा सके। दरअसल, कैंसर मरीज को अभी जितनी दवा दी जा रही है, उसका बहुत कम हिस्सा ही शरीर के सेल्स तक पहुंच पाता है। ऐसे में मरीज को दवा की भारी डोज देनी पड़ती है। मेरी कोशिश है कि यह बाधा खत्म हो जाए। अगर मैं अपने प्रोजेक्ट में सफल रही तो मरीज को दवा दस गुना तक कम देनी पड़ेगी। इस तरह मरीज दवा के साइड इफेक्ट से बच जाएगा। -डॉ. नुसरत जेएम संघमित्रा, संस्थापक व सीईओ साइका ऑन्कोसॉल्यूशंस