‘बांसुरी चली आओ, होठों का निमंत्रण है’ जैसे अपनी गीत के जरिए कुमार विश्वास ने लखनऊ के युवाओं का मन मोह लिया। मौका था एक रियल एस्टेट कंपनी द्वारा आयोजित कुमार विश्वास के कविता पाठ का जिसमें अमर उजाला भी सहयोगी रहा।
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अपने अंदाज व कविताओं से कुमार विश्वास ने लूटा दिल, तस्वीरें
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आशियाना स्थित 3 हजार की क्षमता वाले डॉ. भीमराव अंबेडकर सभागार में करीब 60 प्रतिशत ऑक्यूपेंसी के साथ दर्शकों में 90 प्रतिशत युवा थे, और उन्होंने कुमार की शायरी पर ढेरों वाह वाहियां बरसाई तो कई पंक्तियों पर आहें भी भरकर रह गए।
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इससे पहले अपनी विभिन्न कविताओं को प्रस्तुत करते हुए कुमार बीच बीच में व्यंग्य के बाण भी बराबर चलाते रहे।
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इन बाणों का निशाना कभी विभिन्न पार्टियों के राजनेता होते तो कभी सभागार में व्यवधान पैदा कर रहे दर्शक।
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उनकी लोकप्रिय कविता ‘कोई दीवाना कहता है’, और उसके वाचन के दौरान चले तर्कों व चुटकुलों के दौर ने सभी को अभिभूत किया।
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इस दौरान कुमार ने अपने व्यक्तिगत जीवन से जुड़े कई प्रसंग सुनाकर बताया कि किस तरह 100 रुपये मेहनताने के लिए वे दिसंबर की सर्दियों में टूटे कांच की बसों में सफर करते हुए कविता वाचन करते थे।
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उनकी प्रस्तुति ‘मैं तुम्हें ढूंढता स्वर्ग के द्वार तक...’ को सबसे ज्यादा पसंद किया गया तो ‘हर बार तुम्हारा चेहरा’ को भी भरपूर तालियां मिलीं। इस मौके पर कुमार ने ‘मन तुम्हारा हो गया तो हो गया...’ गीत की पहली पब्लिक परफॉर्मेंस दी। साथ ही दर्शकों से मिली सराहना से उत्साहित होकर कई दफा अपनी कविताएं दोहराई भी।
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कार्यक्रम के दौरान दर्शकों की मांग पर कई कविताओं को कुमार ने प्रस्तुत किया तो वहीं जाने माने शायरों के शेर भी अपने अंदाज में सुनाकर सभी का मन जीता।
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कुमार ने बताया कि वे 17 साल के थे, केकेसी में कविता पाठ करने आए थे। एक लड़का मिला मैंने उससे हाथ मिलाया तो उसने कहा ‘हमको भी सुनना’। उस दिन दोनों की दोस्ती हुई जो अगले 15 वर्ष चली और दो वर्ष पहले देवल की मौत के बाद पूरी हुई।
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कुमार ने देवल का गीत ‘प्रिये तुम्हारी सुधि को मैंने यूं ही अक्सर चूम लिया, तुम पर गीत लिखा, फिर उसका अक्षर अक्षर चूम लिया’, सुनाया और उस पर हुई वाह-वाही पर देवल को याद करते हुए कहा कि लखनऊ ने आज भी उन्हें याद रखे है।