मुंशी नवल किशोर काफी जीवट इंसान थे। उन्हें 19वीं सदी में पेरिस के एल्पाइन प्रेस के बाद लखनऊ में दुनिया का सबसे बड़ा छापाखाना लगाने का श्रेय जाता है। लखनऊ में उत्तर भारत की पहली पेपर मिल लगवाकर शहर में औद्योगिकीकरण की शुरुआत कराने का काम भी इन्हीं के खाते में है।
इसकी स्थापना का किस्सा भी कम दिलचस्प नहीं है। प्रेस की छपी पुस्तकों की डिमांड बढ़ी तो कागज की खपत भी बढ़ी। इसके लिए मुंशी जी इंग्लैंड से कागज मंगाते थे। मुंशी नवल किशोर के प्रपौत्र डॉ. रणजीत भार्गव के संस्मरण से पता चलता है, 1871 में प्रेस के लिए दादा जी को इंग्लैंड से 1,41000 रुपये का कागज खरीदना पड़ा।
आज भले ही इतना रुपया बहुत मायने न रखता हो, लेकिन उस वक्त यह बहुत ज्यादा होता था। स्वदेश प्रेम में डूबे दादा जी ने तय किया कि जिन अंग्रेजों ने देश को गुलाम बनाकर रखा है उन्हें इतना पैसा देने से क्या लाभ।