प्राचीन शिवालयों में शुमार भंवरेश्वर महादेव की महिमा निराली है। भक्त बताते हैं कि यहां का शिवलिंग द्वापर युग का है। महाबली भीम ने इसकी स्थापना की थी। जब पांडवों को वनवास हुआ था तब इसका नाम भीमाशंकर था।
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- फोटो : amarujala
कहते हैं कुर्री सुदौली स्टेट की गायें यहां त्रयंबक नामक वन में चरने आती थी। लौटने पर सभी गाये महल की गौशाला में दूध देती, लेकिन एक गाय दूध ही नहीं देती थी। जब यह बात महल में फैली तो इसकी पड़ताल की गई। तब पता चला कि वन में एक स्थान घनी झाड़ियों से घिरा था, वहीं रोज वह गाय अपना दूध चढ़ा आती थी। जब उस स्थान की सफाई की गई तो मूर्ति दिखाई दी।
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शिव मंदिर
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तब उसी स्थान पर चबूतरा बनवाकर एक झंडा गाढ़ दिया गया और तब इसका नाम पड़ा सिद्धेश्वर। बाद में मुगल शासक औरंगजेब इधर से सेना लेकर गुजर रहा था तो हठ वश उसने शिवलिंग की खुदाई शुरू कर दी। उसने जितना खोदवाया उतना ही विशाल शिवलिंग मिलता गया।
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आखिरकार जब अंत नहीं मिला तो सैनिकों से शिवलिंग की तुड़ाई शुरू करवानी चाही, लेकिन भंवरों ने सैनिकों पर हमला कर दिया। यह देख औरंगजेब ने क्षमा मांगी और एक गुम्बदनुमा छोटी सी मठिया बनवाई।
तब इसका नाम भंवरेश्वर पड़ा। बाद में मंदिर का जीर्णोद्धार कुर्री सुदौली स्टेट ने कराया। मंदिर की पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी गोस्वामी परिवार के पास है। सावन मास में लाखों श्रद्धालु यहां जुटते हैं। मनौती मांगते हैं।