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लाशों के बीच बैग में बजती रही गुड़िया

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जनता एक्सप्रेस की बोगियों के परखच्चे उड़े तो यात्रियों के बैग बाहर ट्रैक पर बिखर गए। ट्रैक किनारे एक काला बैग पड़ा था। उसमें खिलौने की एक गुड़िया रखी थी जिसकी घंटी लगातार बज रही थी।
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लाशों के बीच बैग में बजती रही गुड़िया

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इस खिलौने की मासूम आवाज मातम और चीख-पुकार में दब चुकी थी। किसी का ध्यान इसकी तरफ नहीं गया।
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लाशों के बीच बैग में बजती रही गुड़िया

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पास से गुजरने वालों की नजर बैग पर पड़ी भी, लेकिन किसी की हिम्मत नहीं हुई कि गुड़िया की आवाज बंद कर दे।

लाशों के बीच बैग में बजती रही गुड़िया

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ऐसा लग रहा था कि वो भी बेचैन है कि उस हाथ में पहुंचने को जिसके लिए उसे खरीदा गया था।
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लाशों के बीच बैग में बजती रही गुड़िया

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बैग में रखे कपड़ों से इतना अंदाजा तो जरूर लगाया जा सकता था कि कोई कुछ दिन के लिए कहीं घूमने के लिए कहीं गया होगा और लौटते वक्त अपने लाडले या लाडली के लिए गुड़िया खरीद कर ला रहा था जिसे वो अपनी प्यारी गुड़िया को नहीं दे सका।
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