मशहूर फिल्म अभिनेता ओमपुरी अब हमारे बीच नहीं हैं, कुछ बचा है तो सिर्फ उनकी यादें। यहां हम दे रहा हैं उनका एक इंटरव्यू जो उन्होंने बीते साल अमर उजाला के लखनऊ ऑफिस में दिया था। पढ़ें...
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ओमपुरी
- फोटो : amar ujala
प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता ओमपुरी 13 अक्तूबर 2015 को ‘अमर उजाला’ कार्यालय आए थे। उनकी फिल्म ‘हो गया दिमाग का दही’ प्रदर्शित होने वाली थी और फिल्म एवं अपनी फिल्म यात्रा पर उन्होंने लंबी बातचीत की थी।
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उन्होंने कहा था कि फिल्मों को या तो मानसिक खुराक देते हुए दिमाग की मालिश करने चाहिए या फिर दर्शकों को गुदगुदाते हुए शरीर को हास्य का टॉनिक देना चाहिए। ओमपुरी को हम बड़े परदे पर या तो तमतमाते हुए देखते रहे हैं या फिर गुदगुदाते हुए। एक वह सिनेमा जो हमें तनाव देता है।
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‘आक्रोश’, ‘अर्द्ध सत्य ’ जैसी फिल्मों में वह व्यवस्था से भिड़ते-लड़ते दिखते हैं तो दूसरी ओर ‘जाने भी दो यारों’, ‘चाची 420’, ‘मालामाल वीकली’, ‘हेराफेरी’ में हमें देर तक हंसाते हैं। ओमपुरी ने कहा था कि दो तरह के सिनेमा की जरूरत होती है हमारी जनता को।
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यह उन समस्याओं को लेकर बनता है जिनसे हम जूझ रहे होते हैं, लेकिन ये फिल्में उन समस्याओं का बहुत गंभीरता से शोध और अध्ययन कर बनती हैं। ऐसी फिल्में हमें उन समस्याओं को समझने में मदद करती हैं। वे बताती हैं कि इन समस्याओं की जड़ क्या हैं और हमारे हिसाब से इनका निवारण किस तरह हो सकता है।
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आप इसमें क्या योगदान दे सकते हैं और सरकार से किस योगदान की अपेक्षा है। जब समस्याएं समझ में आ जाती हैं तो दिमाग का बोझ थोड़ा कम होता है। इसी प्रकार दूसरा सिनेमा है जो हमें चाहिए वह जिस्म की मालिश के लिए चाहिए। यह मनोरंजन का सिनेमा है।योगा में कहा गया है कि आपके लिए हंसना बहुत जरूरी है। यह एक टॉनिक की तरह है या तो आप स्वाभाविक तरीके से हंसिए या फिर अस्वाभाविक तरीके से।
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हंसने से आपके दिमाग में वजन कम होता है, शिराएं खुलती हैं और खून का प्रवाह भी बेहतर होता है।‘अर्द्ध सत्य’, ‘आक्रोश’ जैसी फिल्में जरूर देखें राजनेता
ओमपुरी ने ‘अमर उजाला’ कार्यालय में कहा था कि ‘अर्द्ध सत्य’, ‘आक्रोश’ जैसी फिल्में आज नहीं बन रही हैं। ‘आक्रोश’ हमारी राजनीति पर बहुत बड़ा वार था, ‘अर्द्ध सत्य’ भी पुलिस तंत्र को लेकर था और उसमें दिखाया गया था कि किस प्रकार राजनीति की दखल पुलिस तंत्र में होती है।
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उन्होंने कहा था कि राजनेताओं को इस तरह की फिल्में जरूर देखनी चाहिए, जिससे उनको पता चले कि वास्तविक सच्चाई क्या है? होता क्या है कि राजनेता सच्चाई जानने के लिए आदेश देते हैं और सच्चाई पता करने वाले चाय पीकर चले आते हैं। फिल्म वाले ऐसा नहीं करते, वे पूरी छानबीन करते हैं। हाल में ऐसी ही फिल्में ‘जय हो डेमोक्रेसी’ और ‘मिस टनकपुर हाजिर हो’ आईं थीं।
फिल्म ‘गांधीगीरी’ में उन्हें निर्देशित करने वाले लखनऊ के फिल्मकार सनोज कुमार मिश्र कहते हैं कि उनकी अंतिम प्रदर्शित फिल्म ‘गांधीगीरी’ थी, जिसकी शूटिंग उन्होंने 2015 में लखनऊ में की थी। अभी तीन दिन पहले मुंबई में उनसे मुलाकात हुई थी और उन्होंने मुझे एक लाख रुपये यह कहते हुए दिए थे कि तुम्हें इस फिल्म के लोगों ने पैसे नहीं दिए जबकि इसके पीछे तुम्हारी तीन साल की मेहनत है। वे मेरी दूसरी फिल्म ‘इश्क वाला लव’ में भी काम करना चाहते थे। मैंने यह घोषणा भी कर दी थी और मैं उनकी तारीखें लेने गया था, लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था।