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पत्नी की मां के लिए खुद की मां को घर से निकाला

Wed, 25 Jan 2017 02:48 PM IST
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ
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वृद्धाश्रम - फोटो : amar ujala
राजधानी में शनिवार को सामने आई दूरदर्शन के रिटायर्ड निदेशक की मृत्यु अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई। हमें फिर एक बार सोचने को मजबूर कर दिया कि तहजीब और नफासत का शहर लखनऊ बुजुर्गों के लिए कैसा होता जा रहा है? ‘अमर उजाला’ ने यहां के कुछ वृद्धाश्रमों में रह रहे बुजुर्गों से बात की तो उनकी हकीकत सुनकर कलेजा मुंह को आ गया। अपने जैसा भाव पाकर बुजुर्गों ने बताया कि उनके बेटे उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़कर वर्षों तक मिलने नहीं आते। और जो आते हैं वह उनसे कुछ न कुछ लेकर चले जाते हैं। उम्र के आखिरी पड़ाव पर हताशा और अपनों से मिलने की आशा में ही साथियों के साथ हर सुख-दुख बांटते हैं। इन्हें बस एक ही बात सालती है कि जिसे दिनरात खून पसीना बहाकर पढ़ा लिखाकर समाज के चलने लायक बनाया, इक दिन वही उन्हें इस तरह मझधार में छोड़कर चला गया। 
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शीला कपूर - फोटो : amar ujala
बेटे ने समझा बोझ :  सीतापुर के खैराबाद की रहने वाली शीला कपूर पति की मौत के बाद छोटे बेटे ने संभाला। बेटा कारोबारी था, जिसकी ढाई वर्ष पहले दिल्ली में एक सड़क हादसे में मौत हो गई। उसके बाद एक मात्र सहारा बड़ा बेटा शशि कपूर था। लेकिन उसका व्यवहार ऐसा था जैसे मां उसके लिए बोझ हो।
 क्यों आईं यहां : शीला बताती हैं कि बेटे का कारोबार अच्छा है, लेकिन वह पत्नी और सास के प्रभाव में रहता है। यही वजह है कि एक दिन उसे घर से निकाल दिया और कहा कि अब कभी वह उनसे नहीं मिलना चाहता। कुछ संपर्कों के जरिए डेढ़ साल पहले ‘अपना घर महिला’ वृद्धाश्रम आईं थीं।  कोई उम्मीद ? : शीला बताती हैं कि डेढ़ साल से बेटे को नहीं देखा। कहती हैं कि  अब उनका संसार में कोई और नहीं बचा है जिससे कोई उम्मीद रख सकें।
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रव‌ि शंकर - फोटो : amar ujala
बच्चों का प्रोफेशन ही ऐसा है, क्या कहें
रविशंकर द्विवेदी कहते हैं कि वे अकेले हैं तो इसमें बच्चों की गलती नहीं है। दो बेटे पेशे से इंजीनियर हैं। एक हिमाचल और दूसरा तमिलनाडु में है। वे कहते हैं कि अच्छा होता अगर बच्चों से मिलने का मौका मिलता, लेकिन उनका प्रोफेशन ही ऐसा है कि मुलाकात संभव नहीं है। फिर हर तिमाही या छमाही मुलाकात हो जाती है। 
 उम्मीद : बच्चों से दूर रहना कचोटता है, बीमार भी रहते हैं, ऐसे में परिवार से कोई साथ होता तो आधी बीमारी वैसे ही दूर हो जाती।

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भारती - फोटो : amar ujala
ज‌िस अनाथ को पाला, वही छोड़ गया
ऐसे तो बेऔलाद ही ठीक थीं : विडंबना है कि जिस भारती ने संतान न होने पर अभिषेक को अनाथ आश्रम से गोद लिया, वही बेटा मां का पालन-पोषण नहीं कर सका। भारती के पति सतना में एक प्रमुख सीमेंट कंपनी में वाइस प्रेसीडेंट थे। सतना में घर था। रिटायर होने के बाद सतना का घर बेच लखनऊ चले आए। यहां जानकीपुरम में एक फ्लैट लेकर रहने लगे।
पति की मौत के बाद बदल गए अपने: वह कहती है कि पति की मृत्यु के बाद रिश्ते-नातेदारों ने असली रंग दिखाया। बेटे को संपत्ति के लालच में भड़काया गया। सारी संपत्ति बिक गई। जो पैसा मिला, उसका बहुत सा हिस्सा रिश्तेदारों ने हड़प लिया। किराए पर रहने लगीं। एक रात बेटे को फोन पर किसी से बात करते सुना कि वह किसी तरह उन्हें रास्ते से हटाकर बची खुची रकम हड़पना चाहता है। विरोध किया तो बेटा इलाहाबाद चला गया। घर खर्च चलाने के लिए फ्रिज, वॉशिंग मशीन, बर्तन तक बेचने पड़े। अंतत: पांच साल पहले वृद्धाश्रम आना मजबूरी बन गया।
कोई उम्मीद ? : भारती कहती हैं कि ‘अभिषेक को मेरे खिलाफ इस तरह भड़काया गया है कि वह उनकी बात नहीं सुनेगा।’ पति की एक एलआईसी का कुछ पैसा मिलना था, जिसके लिए करीब दो वर्ष पहले वह मिलने आया। पांच साल में यह पहली मुलाकात था, उसने एलआईसी के पेपर और अन्य दस्तावेज लिए और चलता बना। यह वहीं बच्चा था, जिसे कभी उन्हाेंने पूरे कानूनी प्रावधानों के साथ अनाथ आश्रम से गोद लिया था।
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बेलारानी - फोटो : amar ujala
बेटों की गलती नहीं मानतीं 
पृष्ठभूमि : झांसी में अध्यापिका रहीं बेलारानी के पति डॉ. केपी भट्टाचार्या स्वतंत्रता सेनानी थे। देश आजाद हुआ, सरकार ने उन्हें पेंशन देनी चाही, लेकिन उन्हाेंने यह कहते हुए मना कर दिया कि ‘देश उनकी मां हैं, मां की सेवा के लिए कैसा पैसा?’ बेलारानी ने जीवन केे करीब चार दशक पढ़ाया, वह भी बिना वेतन, लेकिन पति की मौत के बाद किसी और की मदद के बजाय वे खुद ही मदद की मोहताज होती चली गईं।
वृद्धाश्रम में कैसे : तीन बेटे में बड़ा बेटा पीएचडी है, मंझले की मौत हो चुकी है और छोटा बेटा शिक्षक है। कहती हैं कि बेटों से उन्हें कोई उम्मीद नहीं है। बड़े बेटे ने एक रोज साफ कह दिया कि ‘आप मां हैं, वो पत्नी है, मुझे उसी के साथ जिंदगी भर रहना है, उससे संबंध खराब नहीं करना चाहता।’ भीगी आंखों से बेलारानी बताती हैं कि डेढ़ साल पहले बेटे ने इस वृद्धाश्रम में लाकर छोड़ दिया। बेटा दिल्ली से साल में 24 हजार रुपये भेज देता है, पर एक साल से बेटे की शक्ल देखने को तरस रही हैं।
किसी से कोई उम्मीद ? : बेलारानी कहती हैं कि उन्हें किसी से कोई उम्मीद नहीं हैं। कहती है ‘इसमें बहू का भी दोष नहीं, अगर बेटा मजबूत होता तो मां के लिए उसे समझौता थोड़े करना पड़ता, समझौते की नौबत आई, इसका मतलब है कि उन्हीं की कोई कमी रही होगी।’ उनका छोटा बेटा झांसी में पढ़ाता है, वे बताती हैं कि झांसी में उनका जो मकान था वह छोटे बेटे को दे दिया है, लेकिन वह भी साथ रखने को तैयार नहीं हैं।
 
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खदेड़ू लाल - फोटो : amar ujala
बेटा इंजीनियर पर किसी को तकलीफ क्यों दूं
करीब साढ़े चार साल से वृद्धाश्रम में रह रहे खदेड़ू लाल ने बताया कि उनका बेटा एनटीपीसी रायबरेली में इंजीनियर है, लेकिन वह नहीं चाहते कि उनकी वजह से किसी को कोई परेशानी हो। खुद शुगर की बीमारी से जूझ रहे खदेडृू लाल ने बताया कि लखनऊ में ही उनकी ससुराल है, लेकिन वे उन्हें भी तकलीफ नहीं देना चाहते। यहां वृद्धाश्रम में सभी के साथ मिल जुलकर रहना मंजूर है।
उम्मीद: उम्र के इस पड़ा पर बस अपनों से मिलने का मन करता है, पर सभी के पास अपने-अपने काम हैं। फिर भी समय मिलने पर उनसे मुलाकात हो जाती है। 
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ऋ‌ष‌िकेश वर्मा - फोटो : amar ujala
बेटी ही मेरा बेटा 
बलरामपुर जिले में डॉक्टर रहे ऋषिकेश वर्मा इस समय कई बीमारियों से घिरे हैं। वे बताते हैं कि उनकी तीन बेटियां हैं, जिनमें छोटी बेटी उनका सबसे ज्यादा ध्यान रख रही हैं। बेटियों को पढ़ाने में खूब पैसा खर्च किया। शायद इसी वजह से आज बेटियां उनका ध्यान रखने के काबिल हैं। सभी की शादी हो चुकी, लेकिन छोटी बेटी एक बेटे की तरह उनका पूरे समय ध्यान रखती हैं। 
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