शिया धर्मगुरु मौलाना डॉ. कल्बे सादिक का मंगलवार की रात को इंतकाल हो गया। शिया धर्मगुरु मौलाना डॉ. कल्बे सादिक आतंकवाद के खिलाफ मुखर दिखते थे। भले ही मामला पैगंबर साहब का कार्टून बनाने को हो या हाफिज सईद सहित मुस्लिम आतंकियों द्वारा उसे जेल से छुड़ाने के लिए हवाई जहाज के अपहरण की घटना हो।
जिन्होंने कहा था कि हाथ में बंदूक थामकर कोई समाधान नहीं निकाला जा सकता है। बेगुनाहों के खून से हाथ लाल करने वाले इस्लाम को मानने वाले नहीं हो सकते। वह कहते थे कि किसी भी किस्म के आतंकवाद का वास्ता किसी भी मजहब से नहीं हो सकता।
मुस्लिम आरक्षण का विरोध
कांग्रेस सहित कुछ सियासी दलों ने मुस्लिमों को आरक्षण का मुद्दा उठाया। कांग्रेस ने तो घोषणा भी की। कोई और होता तो यह सोचकर चुप हो जाता है कि कहीं उसके समाज के लोग नाराज न हो जाएं। पर, डॉ. सादिक तो अलग ही मिट्टी के बने थे।
उन्होंने मुस्लिम आरक्षण का विरोध कर दिया। कहा, आरक्षण लोगों को अपने पैरों पर खड़ा होने से रोकता है। उन्होंने सिख समाज की तारीफ की कि इस कौम ने कभी भी आरक्षण नहीं लिया। पर, मेहनत और संघर्ष से कतरा-कतरा हासिल करके तरक्की की दौड़ में सबसे आगे हैं।
मुसलमानों की खिंचाई में पीछे नहीं
मौलाना मुसलमानों की खिंचाई करने में पीछे नहीं थे। उन्होंने बाराबंकी में मुस्लिम समाज के कार्यक्रम में कहा था कि मुसलमानों से पूछिए कि दीन अर्थात धर्म क्या है? तो वह कहेंगे कि नमाज पढ़ना, रोजे रखना और हज करना। ये सब धार्मिक प्रथाएं हैं, दीन नहीं है। दीन तो वह गुण है जो धार्मिक संस्कार को अदा करने के बाद आता है। मुसलमानों को रिश्वत नहीं लेनी चाहिए। लोगों को दुखी नहीं करना चाहिए। जरूरतमंदों की मदद करनी चाहिए।
बहुत मुश्किल है कल्बे सादिक होना
देश में तीन तलाक का मसला हो अथवा नागरिकता संशोधन कानून का। उन्होंने सरकारों के खिलाफ बेबाक तरीके से असहमति जताई। यह उन्हीं की शख्सियत थी कि इसके बावजूद उन पर कोई अंगुली नहीं उठी। हालांकि उन्हीं के पुत्र ने नागरिकता संशोधन कानून पर विरोध किया तो उस पर मुकदमा हो गया। यही है सादिक होने का और न होने का फर्क।
रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने की शिया धर्मगुरु मौलाना डॉ. कल्बे सादिक से मुलाकात (फाइल फोटो)
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उन्होंने बेबाकी से बात की। बेखटके बात की। बेखौफ होकर संघ व भाजपा के लोगों से मिले। हिंदुओं से रिश्ते रखे। अयोध्या पर आम मौलाना से अलग हिंदुओं के पक्ष में बोले। पर, बेजार कभी नहीं हुए। इसीलिए कहना पड़ेगा कि बहुत मुश्किल है किसी के लिए कल्बे सादिक होना।