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एक साल में कितना बदल गया मोदी का काशी, जानें

Thu, 21 May 2015 03:21 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
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सांसद बनने के बाद पहली बार अपने संसदीय क्षेत्र पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दशाश्वमेध घाट पर कहा था, ‘जब तक काशी राष्ट्रगुरु नहीं बनेगा, भारत विश्व गुरु नहीं बन सकता। मैं इस पवित्र धरती के लिए कुछ करने आया हूं।’

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मोदी के सांसद बने एक साल हो चुके हैं। अस्सी घाट के पास पप्पू टी स्टाल से लेकर बीएचयू के हॉस्टलों तक में आकलन हो रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी के शब्द हकीकत में कितने तब्दील हुए हैं? कुछ मायूस हैं तो कई बेहतर भविष्य को लेकर आशान्वित। उन्हें लगता है कि मोदी ने काशी के विकास की जो बुनियाद रखी है, उसकी बुलंदिया तीन-चार साल में दिखाई पड़ेंगी।
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काशी का अपना अल्हड़ मिजाज, अपनी सोच और धारणाएं हैं। लोगों में काशी का निवासी होने का गौरव और स्वाभिमान है। बाबा विश्वनाथ मंदिर, सारनाथ, कबीर, प्रेमचंद और संत रैदास की भूमि, गंगा के घाट, बनारसी साड़ी और सांस्कृतिक, आध्यात्मिक केंद्र के लिए मशहूर काशी वैसे तो पूर्वांचल के अगड़े जिलों में शुमार है, फिर भी विकास की कसक बहुत नहीं।

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लोकसभा चुनाव में मोदी ने सिर्फ और सिर्फ विकास एवं काशी के गौरव को मुद्दा बनाया। उनके सांसद और प्रधानमंत्री बनने के बाद यहां के लोगों की विकास की उम्मीदों को पंख लग गए। कभी काशी को क्योटो (जापान) का ट्विन सिटी बनाने की बातें हुईं तो बुनकरों के ट्रेड फैलिसेशन सेंटर और क्राफ्ट म्यूजियम का शिलान्यास हुआ। फिलहाल तो यह कि न तो काशी जापान का ट्विन सिटी बनने जा रहा है और न ही बुनकरों की स्थिति में कोई सुधार हो पाया है।
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एनजीओ, संस्थाओं में घाट की सूरत बदलने की लग गई होड़
मोदी ने नवंबर 2014 में अस्सी घाट पर फावड़ा चलाकर घाटों की सफाई का अभियान शुरू किया था। उन्होंने गैर सरकारी संगठनों समेत विभिन्न संस्थाओं से इस काम में मदद का आह्वान किया था। उनकी अपील पर घाटों की सफाई की होड़ लग गई। अस्सी में पप्पू टी स्टाल पर चाय पी रहे बीएचयू के शोध छात्र अभिजीत त्रिपाठी और गदौलिया निवासी राम शंकर जायसवाल कहते हैं कि घाटों की सफाई जरूर हुई है, पर इसमें सरकार का सीधे तौर पर योगदान नहीं है।
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घाट पर जमी टनों सिल्ट एनजीओ और शहर की संस्थाओं ने हटाई है, इसमें सरकारी धन नहीं लगा। उनकी बातों में दम है, अस्सी ही क्यों, अन्य घाटों पर भी सफाई हुई है, लाइटिंग की व्यवस्था हुई है। ट्रैफिक जाम से बचने को अंतिम संस्कार के लिए शवों को मणिकर्णिका व हरिश्चंद्र घाट तक ले जाने के लिए मुफ्त मोटर बोट की सुविधा और कुछ अंतिम यात्रा वाहनों की व्यवस्था गुजरात के एक बड़े बिजनेसमेन की तरफ से की गई है।
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डीएम प्रांजल यादव
बकौल डीएम प्रांजल यादव एनजीओ और संस्थाओं में घाटों को गोद लेने की होड़ मची हुई है। घाटों पर वाईफाई सुविधा, बायो टॉयलेट, पब्लिक टॉयलेट, वाटर एटीएम और सफाई आदि कामों के लिए बीएसएनएल, ओएनजीसी, एयरपोर्ट अथारिटी आफ इंडिया के साथ ही निजी क्षेत्र के लोग भी आगे आ रहे हैं।

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मेयर राम गोपाल मोहले
मेयर रामगोपाल मोहले कहते हैं कि सामाजिक संस्थाएं तो काशी में पहले भी थीं, लेकिन मोदी ने उनमें जागरूकता पैदा की है। पहले फोटो खिंचाने के लिए सफाई होती थी। अब वे काशी के लिए कुछ करना चाहते हैं। कहते हैं कि अस्सी घाट 30-40 सालों से सिल्ट से पटा हुआ था। नई पीढ़ी के लोगों ने अस्सी घाट को वास्तविक रूप में अब देखा है।

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नहीं बदली बुनकरों और साड़ी कारोबार से जुड़े लोगों की हालत
मदनपुरा शहर का बुनकर बहुल इलाका है। यहां के अधिकांश लोग लोग किसी न किसी रूप में बनारसी साड़ी के कारोबार से जुड़े हैं। लेकिन, यहां मायूसी का आलम दिखता है। यहीं के निवासी यार्न कारोबारी रियाद अहमद अंसारी कहते हैं, ‘मोदी जी मुझे शोले की बसंती जैसे लगते है। बीरू स्टेशन पहुंच जाता है, लेकिन बसंती बक-बक करती नहीं रुकती। यही हाल मोदी जी का है। एक साल में उन्होंने भाषण तो बहुत दिए लेकिन काशी में कोई काम नजर नहीं आ रहा’?

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रियाद कहते हैं, ‘बनारसी साड़ी का कारोबार मंदी के दौर में है। एंब्रॉयडरी कंप्यूटर वाले 60 फीसदी पावरलूम केवल एक शिफ्ट में चल रहे हैं। पॉलिस्टर का धागा छह रुपये किलो महंगा हो गया। कुछ धागों के दाम 10 रुपये तक बढ़ गए। नहीं बढ़ रहा तो हमारे माल का रेट। बढ़े भी कैसे, बाजार में खरीदार ही नहीं है। कारीगर, बड़े व्यापारियों को साड़ियां बेच रहे हैं, लेकिन उनसे पैसा नहीं मिल रहा। उनका कहना है कि माल उठाने के लिए पेमेंट कहां से दें? ऐसे में बुनकर क्या खाए? अब तो अरहर दाल भी 85 रुपये से बढ़कर 120 रुपये किलो तक हो र्गई है।

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13700 करोड़ के प्रोजेक्ट स्वीकृत लेकिन धरातल पर नहीं
वाराणसी के विकास के लिए केंद्र ने खजाने का मुंह खोल दिया है। मेयर मोहले का दावा है कि वाराणसी को जोड़ने वाले नौ राजमार्गों समेत विभिन्न परियोजनाओं के लिए केंद्र सरकार ने 13700 करोड़ रुपये स्वीकृत कर दिए हैं। इनमें से कुछ पर काम शुरू हो गया। कुछ पर शुरु होना बाकी है।

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साल भर में चूंकि कोई प्रोजेक्ट धरातल पर नहीं उतरा इसलिए कुछ लोगों में नाउम्मीदी है। डीएम प्रांजल यादव बताते हैं कि अभी तक रिंग रोड के लिए 380.42 करोड़ रुपये स्वीकृत हुए हैं। इस पर काम शुरू हो गया है। 15.30 किमी लंबी रिंग रोड एनएच-56 और एनएच-29 को लिंक करेगी। नेशनल हाईवे अथारिटी ऑफ इंडिया इस प्रोजेक्ट को मार्च 2017 तक पूरा करेगी।

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प्रांजल बताते हैं कि शहर और देहात की बिजली व्यवस्था में सुधार के लिए दो महत्वाकांक्षी परियोजनाएं मंजूर हुई हैं। 572 करोड़ रुपये की इंटीग्रेटेड पावर डवलपमेंट स्कीम से शहर में अंडर ग्रांउंड विद्युत वायरिंग की जाएगी। दीन दयाल ग्रामीण ज्योति परियोजना के लिए 313 करोड़ रुपये स्वीकृत हुए हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में विद्युत व्यवस्था के सुदृढीकरण केकाम होंगे। बिजली के प्रोजेक्टों पर जुलाई-अगस्त तक काम शुरू होगा।

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पर असल चुनौती तो गंगा सफाई ही
बीएचयू के सेवानिवृत्त प्रोफेसर सुरेन्द्र प्रताप कहते हैं कि असली चुनौती गंगा सफाई की है। पिछले एक साल में शोर ज्यादा हुआ है, काम कम। गंगा में गिरने वाले करीब 30 नालों को रोकना बड़ी चुनौती है। मोदी के सांसद बनने के बाद कई परियोजनाएं शुरू हुई हैं, लेकिन उन्हें धरातल पर आने में कम से कम दो साल लगेंगे।
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मेयर मोहले कहते हैं कि गंगा सफाई पर ठोस काम होगा। तीन सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट के लिए केंद्र सरकार ने धन स्वीकृत कर दिया है। इनके टेंडर की कार्यवाही चल रही है। प्लांट बनने के बाद गंगा में गिरने वाले नालों पर प्रभावी रोक लगाई जाएगी।
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