कोरोना से पैदा हुए हालातों ने युवाओं को दो साल से कॅरिअर की चिंता के ऐसे चक्रव्यूह में फंसाया है, जिससे वे चाहकर भी नहीं निकल पा रहे हैं। अप्रैल में जिस तेजी से संक्रमण की दूसरी लहर आई, उसमें तो कोई कुछ सोच नहीं पाया, क्योंकि लोग बीमारी से ही नहीं उबर पा रहे थे। इसकी रफ्तार थमने के बाद जिंदगी ने जैसे-जैसे रफ्तार पकड़ना शुरू किया, युवाओं का फोकस फिर कॅरिअर पर हो गया। मई से लेकर अब तक कॅरिअर काउंसलर, मनोवैज्ञानिक परामर्शदाताओं के फोन घनघना रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सामान्य चिंता का स्तर दो साल में एंग्जाइटी अटैक में बदल गया है। युवाओं से लगातार संवाद जरूरी है।
चिंता इसकी कि मेहनत का क्या परिणाम होगा
इंदिरानगर में किराये का कमरा लेकर दो साल से नीट की तैयारी में जुटे तीन प्रतियोगी छात्र एक साल से मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता के संपर्क में हैं। इस साल उनकी चिंता एंग्जाइटी अटैक तक जा पहुंची है। काउंसिलिंग के बाद अब दवाएं भी दी जा रही हैं। दरअसल, इनकी चिंता है कि बोर्ड में प्रमोट कर दिए जाने से प्रतियोगी छात्रों की संख्या बढ़ेगी और कटऑफ ऊपर जाएगा। दो साल से वे नीट की तैयारी कर रहे हैं, उनकी मेहनत का क्या जाने क्या परिणाम निकले।