फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कोरोना ने जिंदगी के साथ ही साहित्य की दुनिया को भी बदल डाला. शायरों- कवियों ने बयां किया दर्द

Wed, 08 Jul 2020 05:30 PM IST
ishwar ashish आरिफ, अमर उजाला, लखनऊ
विज्ञापन
1 of 5
शायरा आयशा अय्यूब, कवि पंकज प्रसून - फोटो : amar ujala
एक शायर और कवि की खुराक उसे महफिल में मिलने वाली वाहवाही होती है। जब से लॉकडाउन हुआ है, सभागार बंद हो गए। अब न तो कवि सम्मेलन हो रहे हैं न मुशायरों की रौनक दिख रही। वाह...वाह और तालियों की गूंज से कान महरूम हैं। कोरोना और लॉकडाउन ने जिंदगी के साथ ही साहित्य की दुनिया भी बदल दी है। इन बदले हालात में मुशायरे और कवि सम्मेलन का स्वरूप ही बदल गया। इन्हीं हालातों पेश है रिपोर्ट।

 
विज्ञापन

2 of 5
शायर नवाज देवबंदी - फोटो : amar ujala
मुशायरों की होती है एक रूह
मुशायरों की एक रूह होती है। शायर जब कलाम पढ़ता है तो उसे श्रोताओं से रिएक्शन मिलता है, जिससे मुशायरों में जान आती है। ऑनलानइन मुशायरों में शायर इस मजे से महरूम रहता है। शेर पर मिलने वाली तारीफ शायर की ताकत है, यह कहना उर्दू अकादमी के पूर्व चेयरमैन और शायर नवाज देवबंदी का। बताते हैं कि दुबई में एक बार मुशायरे में जैसे ही कलाम पढ़ने खड़ा हुआ। एक साहब ने बुलंद आवाज में मुझे छेड़ने की गरज से सलाम किया। जिसका जवाब देकर बोला, ‘जो लोग घरों में अपने वालदैन (माता-पिता) को सलाम नहीं करते वो मुशायरों में आकर सलाम करते हैं, ये मुशायरों की तहजीब है। एक जमाना था, जैसे ही लोगों को पता चलता था कि आज शहर में मुशायरा है तो अपने बच्चों से कहते कि जाओ आज बिना तख्ती और स्लेट के क्लास लगेगी। वहां से तहजीब सीख कर आओ। मुझे लगता है इन सलाम करने वाले साहब को यहां तहजीब सीखने के लिए ही भेजा गया है। इस तरह की नोकझोंक मुशायरों की जिंदगी हैं। जो उसमें रूह पैदा करती हैं। किसी शायर ने क्या खूब कहा है। ए बुत-तराश इश्क को हैरत में डाल दे, पत्थर की आंख से कोई आंसू निकाल दे।

 
विज्ञापन

3 of 5
शायरा आयशा अय्यूब - फोटो : amar ujala
दाद नहीं मिलती
शायरा आयशा अय्यूब बताती हैं कि ऑनलाइन होने वाले मुशायरे में चूंकि हम दर्शकों से रूबरू नहीं होते। साथी शायर ही हमें दिखते हैं और हौसलाअफजाई कर दर्शकों की कमी पूरी करने की कोशिश करते हैं। लिहाजा इसे मुशायरे की जगह नशिस्त (छोटी महफिल, जो प्राय: घरों में सजती है) कहा जाना चाहिए। लॉकडाउन ने जब जिंदगी ही बदल दी तो मुशायरों में हुए बदलाव को भी स्वीकार करना चाहिए। बस वहीं एक बात... हमारा शायरों का टॉनिक मानें दाद नहीं मिलती तो दिल कह उठता है।
कर रहा हूं तुझे खुशी से बसर
जिंदगी तुझ से दाद चाहता हूं।


 

4 of 5
शायर मनीष शुक्ल - फोटो : amar ujala
अधूरापन सा लगता है
हिंदी संस्थान के पूर्व निदेशक, प्रशासनिक अधिकारी और मशहूर शायर मनीष शुक्ल बताते हैं कि इस मुश्किल दौर में शायर अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। ऐसे में ऑनलाइन मुशायरा कुछ न होने से तो बेहतर है। कुछ ऑनलाइन मुशायरों का मुझे भी हिस्सा बनने का मौका मिला और कुछ होने वाले हैं। शायरी के शौकीन दर्शकों को तो इसमें खूब लुत्फ आता है, हम शायरों को कुछ कम। जब तक लोगोें का रद्दे-अमल न पता चले कुछ अधूरापन सा लगता है। हालांकि इसमें कोई शक नहीं कि ऑनलाइन मुशायरों नेे साहित्य जगत में आए अधूरेपन को भरा है।
 
विज्ञापन
विज्ञापन

5 of 5
कवि पंकज प्रसून - फोटो : amar ujala
मूड का नहीं चलता पता 
वैज्ञानिक और कवि पंकज प्रसून बताते हैं कि ऑनलाइन मुशायरा आयोजकों के लिए तो फायदे का सौदा है। ऑडिटोरियम के किराए से लेकर शायरों को पारिश्रमिक और आने-जाने का खर्च तक उन्हें नहीं देना पड़ता। वैसे ऑनलाइन कवि सम्मेलन और मुशायरों में लोगों का मूड नहीं पता चलता। कोई भी कवि दर्शकों का मूड देखकर कलाम सुनाता है। ऐसे में हमको पहले से सोचा हुआ ही पढ़ना पढ़ता है, जिसमें संतुष्टि नहीं मिल पाती। 

 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें