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13 तस्वीरों से जानें, कैसा है सोनिया का गोद लिया 'उड़वा' गांव

Mon, 25 May 2015 12:54 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
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(अशोक शर्मा) उड़वा। बजरंग पांडेय। उम्र सौ साल। ढलती उम्र के बावजूद चेहरे पर चमक। आवाज ऐसी कड़क कि किसी का भी ध्यान खींच ले। पर, गांव के विकास की बात पर एकदम मायूस हो जाते हैं। खेती करके परिवार चलाते हैं। वर्षों से कच्चे मकान में रह रहे हैं। पक्के मकान की उम्मीद छोड़ चुके हैं।

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कहते हैं न कुछ बदला और न अब बदलने की उम्मीद है। यही मायूसी ज्यादातर ग्रामीणों के चेहरे पर साफ झलकती है। यह बदरंग तस्वीर है उस गांव की जिसे सांसद सोनिया गांधी ने आदर्श बनाने के लिए गोद लिया हुआ है।
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गांव में बेटियों की उच्च शिक्षा के लिए कॉलेज तो बहुत दूर की बात है, टॉयलेट तक की व्यवस्था नहीं है। लोग कुओं का पानी पी रहे हैं। बिजली आती नहीं, फसलों की सिंचाई के लिए पानी का संकट है। इंदिरा और लोहिया आवास तक नहीं मिले।

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रायबरेली से 25 किमी दूर इलाहाबाद हाइवे पर जगतपुर-सलोन मार्ग से तीन किमी अंदर बसा प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के महायोद्धा राना बेनी माधव की जन्मस्थली उड़वा गांव सात महीने पहले सोनिया के गोद लेने पर खास तो हुआ, लेकिन कोई बदलाव नहीं हुआ।
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गांव में प्रवेश करते ही झुग्गी-झोपड़ी, उबड़-खाबड़ रास्ते, कुएं से पानी भरती महिलाएं और हाथ से पंखा झलते लोग दिखाई पड़ जाते हैं। सतरानी, बृजनंदन, सुकमती, जागेश्वर कहते हैं कि गांव गोद लेने के बाद तो मानो सब कुछ थम गया है।
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कई दलों के जनप्रतिनिधि खासकर सपा के नेता गांव आते हैं, लेकिन यह कहकर लौट जाते हैं कि यह तो सोनिया का गोद लिया गांव हैं। यहां तो विकास होगा ही। विकास विभाग के अधिकारी भी किनारा कसे हुए हैं।
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मुख्य गांव उड़वा ही नही, उसके मजरे पूरे तिवारी, विष्णुपुर, पूरे मदार, शिवगंज, पूरे लालू, पूरे झाम, गोलादांज और नंदन सिंह का पुरवा और झंडा का पुरवा विकास से अछूते हैं। इन गांवों में जाने के लिए ग्रामीणों को कच्चे रास्ते का सहारा लेना पड़ता है। बेनी माधव की खंडहर हो चुकी जन्मस्थली का कायाकल्प करने की भी किसी को सुधि नहीं है।

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उड़वा गांव एक नजर में
500 साल पुराना गांव
आबादी--3882
परिवार--695
साक्षरता--70 फीसदी
मकान--600
पक्के मकान--100
कच्चे--250
झोपड़ीनुमा-टीनशेड--250
खेती योग्य भूमि--दो हजार हेक्टेयर
कुल किसान--620

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गोद तो लिया पर गांव देखने नहीं आईं
ग्रामीणों को इस बात का मलाल है कि सांसद ने उड़वा गांव को गोद तो ले लिया, लेकिन न तो उसे देखने आईं और न ही उनका कोई नुमाइंदा लोगों का दुखदर्द जानने आया। सांसद निधि से विकास के लिए अभी तक फूटी कौड़ी भी नहीं मिली। ग्रामीणों के मुताबिक सुनाई पड़ रहा है कि सड़क और हैंडपंपों के लिए प्रस्ताव बनाए गए हैं। इन प्रस्तावों पर धन कब मिलेगा, कब विकास होगा, इस बारे में किसी को कुछ नहीं पता।

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बैंक, अस्पताल, बस, सड़क तक की सुविधा नहीं
उड़वा की बदहाली यह कि गांव में अस्पताल, बैंक तक की सुविधा नहीं है। महिला या किसी बच्चे की तबियत खराब हो जाए तो उसे इलाज के लिए छह किमी दूर ले जाना पड़ता है। सड़क इतनी खराब है कि गर्भवती महिलाओं को अस्पताल पहुंचाना जानलेवा साबित हो सकता है। जगतपुर-सलोन रोड से उड़वा जाने के लिए हाल ही में सड़क की मरम्मत कराई गई, लेकिन बनी इतनी खराब है कि बाइक या कार की धीमी रफ्तार से ही हादसे का भय सताने लगता है। उड़वा तक जाने के लिए कोई बस नहीं है।

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बेटियों के लिए पढ़ाई और प्रसाधन की समस्या
उड़वा को सोनिया के गोद लेने से पहले से ही दो प्राइमरी और एक पूर्व माध्यमिक स्कूल चल रहे हैं। बेटियों के लिए इंटर या फिरइसके आगे की पढ़ाई के लिए इंटर कॉलेज या डिग्री कॉलेज खोलने के कोई प्रयास नहीं किए गए। यही वजह है कि ज्यादातर माता-पिता बेटियों की आगे की पढ़ाई रोक देते हैं।

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कहने को तो यहां की साक्षरता 70 फीसदी, लेकिन अधिकांश केवल हस्ताक्षर करना ही जानते हैं। गांव में एक भी सरकारी टॉयलेट नहीं बना है। करीब 12 लोगों ने निजी प्रसाधन बनवाए हैं। ग्राम प्रधान मंजू देवी के पति दर्शन पासवान कहते हैं कि प्रसाधन मिले ही नहीं तो बनवाए कहां से।

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समस्याएं जस की तस
जलनिकासी के लिए न नालियां बनीं और न नाला
सिंचाई के लिए एक सरकारी नलकूप, नहरें नहीं हैं
पेयजल के लिए हैंडपंपों के साथ कुओं का सहारा
बच्चों को खेलने के लिए मैदान तक नहीं
बारिश के दिनों में गांव में लबालब पानी भर जाता है
उड़वा के कई मजरों में जाने के लिए रास्ता नहीं
आंगनबाड़ी केंद्र हैं, पर उनको अपना भवन नहीं मिला
बस की सुविधा न पहले थी और न अब तक हो पाई
कई दशक पहले सिंहापुर माइनर थी, जो पाट दी गई
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