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प्लास्टिकनुमा स्किन के साथ पैदा हुआ बच्चा, डॉक्टर बोले- रोया तो फट सकती है स्किन

Sat, 26 May 2018 08:51 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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कोलोडियन बेबी
बलरामपुर की महिला ने श्रावस्ती के उपस्वास्थ्य केंद्र पर बेटे को जन्म दिया। परिवार के लोग खुश हो गए। लेकिन जब पता चला कि नवजात कोलोडियन बेबी है तो खुशियां काफूर हो गईं। चिकित्सक भी चौंक पड़े। कई जगह भटकने के बाद बच्चे को शहर के एक निजी क्लीनिक में भर्ती कराया गया है। उसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया है। चिकित्सक के मुताबिक क्रोमोसोम की समस्या से यह बीमारी होती है। 10 लाख बच्चों में एक बेबी इस रोग से ग्रसित मिलता है। ऐसे बच्चों की स्किन प्लास्टिकनुमा होती है जो उसके रोने से भी फट सकती है।
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कोलोडियन बेबी
बलरामपुर जिले के हरैया थाना क्षेत्र के चौधरीडीह बिनहौनी कला गांव निवासी अनीता देवी (23) को गुरुवार दोपहर में प्रसव पीड़ा शुरू हुई तो पति अलखराम ने पत्नी को प्रसव के लिए श्रावस्ती जिले के सिरसिया में स्थित बालापुर उप स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया। यहां पर दोपहर 12:25 बजे अनीता ने बेटे को जन्म दिया। लेकिन डॉक्टरों ने जैसे ही बताया कि उसकी खाल प्लास्टिकनुमा है। उसे सांस लेने में भी तकलीफ हो रही है।
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कोलोडियन बेबी
इसके बाद उसे जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया। वहां के डॉक्टरों के भी हाथ खड़े करने पर अलखराम नवजात को लेकर बलरामपुर जिला अस्पताल पहुंचे। बाद में बहराइच जिला अस्पताल में भी डॉक्टरों ने असमर्थता जता दी। इस पर अलखराम ने नवजात को महेश पॉली क्लीनिक में दिखाया। जहां बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. शिशिर अग्रवाल नवजात को देखते ही चौंक पड़े। बोले यह कोलोडियन बेबी है। यह काफी रेयर केस है। इलाके में यह अब तक का पहला मामला है। डॉ. शिशिर ने बताया कि कोलोडियन बेबी को लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखकर इलाज शुरू किया गया है। निरंतर इलाज से बच्चे की हालत में सुधार की उम्मीद है।  

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कोलोडियन बेबी
डॉ. शिशिर अग्रवाल ने बताया कि जेनेटिक डिसार्डर से कोलोडियन बेबी का जन्म होता है। लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर विशेष जेली लगाकर उसे आइसोलेशन में रखा गया है। क्योंकि नवजात को संक्रमण का भी खतरा है। अमृतसर में काफी पहले कोलोडियन बेबी मिला था। लता मंगेशकर अस्पताल नागपुर में भी एक कोलोडियन बेबी का मामला सामने आया था। मेडिकल साइंस में इस पर रिसर्च चल रही है।  
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कोलोडियन बेबी
पीजीआई में मेटरनल एंड चाइल्ड हेल्थ की हेड प्रो. मंदाकिनी प्रधान ने बताया कि ये एक अनुवांशिक बीमारी है। जो काफी दुर्लभ है। इसमें शिशु की खाल ऐसी होती है जैसे की उसकी त्वचा पूरी तरह से फटी-फटी रहती है। ऐसे बच्चे ज्यादा समय तक जिंदा नहीं रहते। जिन परिवार में ऐसा बच्चा पैदा होता है उस परिवार में दूसरा कोलोडियन बेबी होने की संभावना 25 फीसदी तक होती है।
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कोलोडियन बेबी
इसे हर्लेक्वीन इस्थीसिस भी कहते हैं। यदि किसी को ऐसा बच्चा पहला होता है तो वह एसजीपीजीआई में दोबारा गर्भवती होने के बाद तीन महीने पर जांच करा सकते हैं। जिससे दोबारा हर्लेक्वीन इस्थीसिस या कोलोडियन बच्चा पैदा न हो सके। यदि गर्भस्थ में ऐसी दिक्कत होती है माता-पिता को गर्भपात कराने की सलाह दी जाती है। इस तरह मामले एसजीपीजीआई में पहले आ चुके हैं।
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