इन तस्वीरों को गौर से देखिए। कुछ याद आया...। ये तस्वीरें 80 के दशक तक छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में लगने वाले आंचलिक मेलों में आम हुआ करती थीं। ये मेले मनोरंजन के बेहतरीन साधन हुआ करते थे। धीरे-धीरे जीवन में टेलीविजन आया तो घरों में ही मनोरंजन के नए साधन के द्वार खुलने लगे। वक्त गुजरा तो कंप्यूटर और मोबाइल पर ही बड़ों के साथ बच्चों का भी ज्यादातर वक्त गुजरने लगा। फिर मेलों की जगह मॉल लेने लगे। ...और देखते ही देखते हमारे जीवन से परंपरागत मेलों का उत्साह भी जाता रहा। डिफेंस एक्सपो के दौरान शुक्रवार को बहुत से बच्चों ने अपने पिता, मां, बाबा और प्रियजनों के कंधे पर बैठकर सेना के शौर्य प्रदर्शन को देखा। यह देखकर बहुत से लोगों के जेहन में एक बार फिर से अपना बचपन और वो मेले याद आ गए।
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डिफेंस एक्सपो
- फोटो : अमर उजाला
दरअसल, शुक्रवार को डिफेंस एक्सपो के दौरान उम्मीद से ज्यादा भीड़ उमड़ी। हालत यह थी कि आयोजन स्थल पर इतनी भीड़ हो गई कि बाकी लोगों को एंट्री ही नहीं मिली और उन्हें बाहर ही रोक दिया गया। लोग परिवार के साथ एक्सपो देखने आए थे। उनमें बुजुर्ग थे तो बड़ी तादाद में बच्चे भी थे।
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डिफेंस एक्सपो
- फोटो : अमर उजाला
अति उत्साहित बच्चों को समझाना जब अभिभावकों के लिए मुश्किल हुआ तो उन्होंने बाहर से ही बैरिकेडिंग, बाउंड्रीवाल और जालियों या फिर ऐसे स्थान पर जाकर सेना का शौर्य प्रदर्शन देखने का प्रयास किया जहां से वे बच्चों के हठ को शांत कर सकते थे। भीड़ ज्यादा होने की वजह से छोटे बच्चों को अपने कंधे पर बैठाकर अभिभावकों ने एक्सपो परिसर में चल रहे लाइव शो को दिखाने की कोशिश की।
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डिफेंस एक्सपो
- फोटो : अमर उजाला
गोमती रिवर फ्रंट हो या फिर वृंदावन सेक्टर-15, दोनों ही जगह एक्सपो के दौरान ऐसे सैकड़ों बच्चे दिखाई दिए जिनके हठ ने अभिभावकों को भी मजबूर कर दिया। अभिभावकों ने बच्चों को अपने कंधे पर बिठाया और उन्हें एशिया के इस सबसे बड़े डिफेंस एक्सपो के नजारे दिखाए। ये बच्चे जब बड़े होेंगे तो शायद ये तस्वीरें उनके लिए जीवन की अनमोल धरोहर होंगी। x
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डिफेंस एक्सपो
- फोटो : अमर उजाला
वे फख्र से कहेंगे कि उन्होंने किस तरह से एक्सपो को देखा था, वे भी ये कहानी आने वाली पीढ़ियों को सुनाएंगे। जिन प्रौढ़ व बुजुर्गों ने बच्चों को इस तरह से अभिभावकों के कंधे पर बैठकर एक्सपो का आनंद लेते देखा, उन्हें भी अपना वो वक्त जरूर याद आया होगा जब वे भी बचपन में ऐसा ही किया करते थे।
उस दौर की यादें शायद उनके जेहन में कुछ इस तरह से ताजा हुई होंगी-
घर की मुंडेर से तारों का मेला देखते थे हम।
ईद-दशहरे पर खुशियों का रेला देखते थे हम।
इन बच्चों को देखा तो पुराना वक्त याद आया।
जब पिता के कंधे पर बैठ मेला देखते थे हम।