ये बातें... नई-पुरानी, यूं ही तो नहीं
- डेढ़ लाख प्रतिमाह के पैकेज पर सरकारी नौकरी करने वाली डॉ. सिन्हा कहती हैं कि मेरी शादी तय होते वक्त कोई मांग नहीं थी। तय होते ही गाड़ी-जेवर-कपड़े समेत अन्य ख्वाहिशों का एक पुलिंदा मेरे ससुरालवालों की ओर से आया था।
- रविन्द्र कहते हैं कि मेरे परिवार की दो लड़कियों की शादियां हुईं। एक में 10 लाख कैश बस, क्योंकि लड़के का वेतन लड़की से दो लाख रुपये सालाना कम था। दूसरी की शादी कैश 20 लाख, क्योंकि लड़के का वेतन दोगुना ज्यादा था। हम लोग ब्राह्मण हैं, शहरी क्षेत्र में हैं। लड़कियां पढ़ी-लिखी हैं, तो मांग कम होती है। फिर भी शादी का पैकेज 25 से 30 लाख हो ही जाता है। गांव की तरफ बढ़ें तो मांग अलग है, चाहे जमीन-घर बेचकर करो।
- माता-पिता के मुताबिक, दहेज नहीं मांगा किसी ने, हमने जो किया खुद से किया। विवाह तो एक बार ही करना है, इसलिए हम सब कुछ देंगे।
- कुछ समुदायों में रिश्ता तय करने पहुंचे लड़की वालों से पूछा जाता है कि आपका अपना संकल्प क्या है। वहीं पिता खुद भी बताते हैं कि हमारा संकल्प बस इतना है।
- हमें सामान नहीं चाहिए, आपकी बेटी के जेवर के लिए आप क्या देंगे।
- बस तिलक इतने से करें, क्योंकि समाज तो वही देखता है।