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लखनऊ के इसी घर में अटलजी ने सीखा था राजनीति का ककहरा, तस्वीरें

Fri, 17 Aug 2018 11:47 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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atal ji - फोटो : amar ujala
अटलजी की राजनीतिक पाठशाला अमीनाबाद की मारवाड़ी गली के मशहूर कलंत्री निवास में लगा करती थी। 1950 के शुरुआती दशक में यहीं पर उन्होंने स्वर्गीय पं. दीनदयाल उपाध्याय की सरपरस्ती में राजनीति का ककहरा सीखना शुरू किया था। कलंत्री निवास गवाह है अटलजी के लखनऊ प्रवास के उस दौर का जब वह कानपुर से पढ़ाई कर यहां आए और राष्ट्रधर्म से जुड़ गए। तब के हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और समाजसेवी स्वर्गीय कृष्ण गोपाल कलंत्री और पं. दीनदयाल करीबी व घनिष्ठ मित्र थे। 
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atal ji - फोटो : amar ujala
स्वर्गीय कृष्ण गोपाल के पुत्र राजेन्द्र गोपाल कलंत्री ने बताया कि हालांकि अटजी और पिताजी की उम्र में आठ से दस साल का अंतर था, लेकिन दोस्ती बड़ी पक्की थी। 1950 के दशक में जब वह लखनऊ आए तो कई मित्रों के घर उनके ठिकाने बने, लेकिन शुरुआती दिनों में कलंत्री निवास उनकी पहचान बना था। 
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atal ji - फोटो : amar ujala
चलती थीं जनसंघ की लंबी बैठकें
राजेन्द्र गोपाल बताते हैं कि हमारे ऊपर के हॉलनुमा कमरे में जनसंघ की लंबी बैठकों का दौर आए दिन चलता था। सुबह से दोपहर और दोपहर से रात तक हो जाती थीं। वह बताते हैं कि अटजी खाने के शौकीन थे। माताजी गौरा देवी व घर के अन्य बड़े सबके लिए खानपान की व्यवस्था रखते थे। अटलजी बीच-बीच में शंभू हलवाई को कमरे की खिड़की से आवाज लगा देते। कभी जलेबी तो कभी रबड़ी। खुद भी खाते और हम सबको भी बुला कर खिलाते थे।

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atal ji - फोटो : amar ujala
घर पर हुई बैठक में तय हुआ था कि अटलजी लड़ेंगे लोकसभा चुनाव
राजेन्द्र कलंत्री कहते हैं कि 1951-52 में लोकसभा चुनावों के दौरान घर पर एक बड़ी बैठक हुई, जो दोपहर से लेकर लगभग रात तक चली। वह बताते हैं कि उसी में तय हुआ कि अटल जी लखनऊ से लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे और पिताजी विधायकी लड़ेंगे। पर्चा दाखिल हुआ और जुलूस घर से ही निकला, अमीनाबाद समेत कई इलाकों में घूमा। पिताजी और अटलजी दोनों ने एक दूसरे के लिए खूब वोट मांगे। नतीजा मनमाफिक नहीं रहा, लेकिन उसके बाद भी अपनी पत्रिका के लिए अमीनाबाद में उनका प्रवास लंबे समय तक रहा। 
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atal ji - फोटो : amar ujala
पारिवारिक समारोह में शिरकत की
राजेन्द्र गोपाल बताते हैं कि मकान के नीचे वाले कमरे में वह पत्रिका के कार्यालयी काम निपटाते थे। कलंत्री मंदिर में उनकी पत्रिकाओं के बंडल रखवाए जाते थे। फिर वह बलरामपुर से चुनाव लड़ने चले गए। इसके बाद भी उनका लगातार आना लगा रहा। राजेन्द्र गोपाल कलंत्री बताते हैं कि 1969 में मेरी शादी के अलावा पुत्रों के जन्मदिन की पार्टी में भी वो आए, ठहरे और चाव से दावत का लुत्फ लिया। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी जब लखनऊ आना होता तो भी उनसे मुलाकात जरूर होती वो लखनऊ आने से पहले हमें खबर कर दिया करते।
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