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भुलाए नहीं भूलतीं अटल से वो मुलाकातें, एक नहीं सैकड़ों लोगों के दिलों में आज भी ‘अटल’ हैं वाजपेयी

Wed, 25 Dec 2019 10:56 AM IST
शाहरुख खान अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ
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फाइल फोटो
जन्मदिन तो पिछली बार भी स्व. अटल का जयंती के रूप में मना था। इस बार भी मनने जा रहा है। तब लगभग सवा चार महीने हुए थे और अब लगभग सवा 16 महीने। पर, अटल हैं कि लोगों को भुलाए नहीं भूलते। प्रदेश में एक नहीं सैकड़ों लोग ऐसे हैं जिनके दिल में वाजपेयी आज भी ‘अटल’ हैं। किसी के दिलोदिमाग पर अटल का अंदाज-ए-बयां छाया है तो किसी केदिल में अमीनाबाद में शंभू हलवाई की दुकान पर मलाई खाने के दौरान अटल की मुलाकात की यादें ताजा हैं।
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
भाषण दिलाओगे तो शरबत कौन पिलाएगा
50 के दशक की बात होगी। अमीनाबाद में शंभू हलवाई की दुकान पर अटलजी से मुलाकात हुई । वह उस समय कृष्णगोपाल कलंत्री के यहां मारवाड़ी गली में रहा करते थे। नगर महापालिका का चुनाव था। अटलजी जनसंघ के उम्मीदवारों का समर्थन कर रहे थे और मैं कांग्रेस का। एक लाउडस्पीकर कलंत्री जी के आवास पर और दूसरा नजीराबाद में एक होटल के ऊपर लगा था। पहले दिन की बात है। वह टहलते हुए आए और बोले, ‘चलो! सुंदर की दुकान पर शरबत पीकर आते हैं।’
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
एक दिन उन्होंने कई बार शरबत पिया। मैंने पूछा, ‘क्या बात है? आज कई बार शरबत।’ हंसते हुए बोले, ‘अरे भाई! तुम्हारी तरफ तो कई लोग हैं। इसलिए बोलते-बोलते किसी का गला नहीं सूखता। पर, मुझे तो अकेले ही बोलना है। जब कई बार बोलने को मजबूर करोगे तो शरबत कौन पिलाएगा।’ यह कहते हुए उन्होंने मेरे हाथ पर हाथ मारते हुए जोर का ठहाका लगाते हुए कहा, ‘कम बोलो या शरबत पिलाओ।’ लगता है कि आज भी कानों में उनकी वह हंसी गूंज रही है। 
डॉ दाऊजी गुप्त, पूर्व महापौर व पूर्व विधायक
 

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फाइल फोटो
पढ़ाया जिंदगी का फलसफा
मेरी अटल जी से पहली मुलाकात 71 में हुई। अटल जी के बुआ के लड़़के पं. जगदीश चंद्र दीक्षित सीतापुर से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे। उनके चुने जाने के बाद हम लोग अटलजी से मिलने गए। काफी अपनत्व से मिले। बोले, ‘ध्यान रखना कि सार्वजनिक जीवन में विश्वसनीयता, ईमानदारी और परस्पर सौहार्द से बढ़कर कुछ नहीं है।’ अटलजी की और हमारी मुलाकातें लगातार होती रहीं। 
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फाइल फोटो - फोटो : amar ujala
एक बार मैं पत्नी जाकिया और बेटे सुलेमान के साथ लंदन से वापस आ रहा था। अटलजी संयोग से उसी विमान में थे और मेरी व उनकी सीट अगल-बगल थी। उन्होंने सुलेमान से पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछा। सुलेमान ने इतिहास की पढ़ाई की बात बताई। अटल जी मुझसे बोले, ‘आप पीछे बहू के साथ बैठें मैं साहबजादे के साथ बात करूंगा।’ वह रास्ते भर सुलेमान से इतिहास पर चर्चा करते रहे। जैसे कोई अपने हम उम्र से बात कर रहा हो।  
डॉ. अम्मार रिजवी पूर्व कार्यवाहक मुख्यमंत्री, पूर्व मंत्री, नेता प्रतिपक्ष व विधानसभा उपाध्यक्ष 
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पंडित जवाहर लाल नेहरू - फोटो : BBC
पंडित जी का परिचय न कराने का कुछ तो मतलब है ही
1962 के प्रतापगढ़ में तत्कालीन सांसद मुनीश्वर दत्त उपाध्याय कांग्रेस से लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे। जनसंघ से उनका मुकाबला राजा अजित प्रताप कर रहे थे। संयोग से एक दिन एक ही समय वहां जवाहर लाल नेहरू और अटल बिहारी वाजपेयी की सभाएं लग गईं। मैं नेहरू और अटल को सुनने गया था। मुनीश्वर दत्त उपाध्याय नेहरू से बार-बार अपना परिचय कराने को कह रहे थे। 
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फाइल फोटो
उपाध्याय जी के लगातार मनुहार करने पर नेहरू जी खीझ गए। बोले, ‘दो बार सांसद रहने के बावजूद परिचय कराना पड़े तो फिर मतलब क्या है..!’ उधर, अटल जी ने बोलना शुरू कर दिया। मंच पर राजा अजित प्रताप हाथ बांधे खड़े थे। बोले, ‘सुना है कि पंडितजी ने कांग्रेस के उम्मीदवार का परिचय नहीं बताया, जिसके बारे में पंडित जी नहीं बताना चाहते तो उनके बारे में आप लोग ही जानकर क्या करिएगा।’ अटल जी के इस भाषण ने और उछाले गए सवाल ने लोगों में इतना असर किया कि उपाध्याय जी तीसरा चुनाव हार गए। अब ऐसे सरस्वती पुत्र नेता कहां..। 
विंध्यवासिनी कुमार..पूर्व नेता भाजपा विधान परिषद

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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
और हट गया टाडा
बात 1993-94 की है। अटल बिहारी वाजपेयी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष थे। मेरे पिताजी बद्री प्रसाद अवस्थी लखनऊ महानगर के अध्यक्ष थे और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे । उन्होंने एक मामले में पिताजी पर ‘टाडा’ लगा दिया। आरोप लगा कि मुलायम सिंह यादव पर हमला करने की नीयत से आए तिलंगे ने अवस्थी से मुलाकात की थी। यह बात अटलजी को मालूम हुई तो उन्होंने इसे लोकसभा में उठा दिया। 

 
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फाइल फोटो - फोटो : amar ujala
सवाल किया, ‘किसी राजनीतिक व्यक्ति के पास यदि कोई मिलने आता है तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह भी किसी षड्यंत्र में शामिल है। ऐसा होने लगेगा तो राजनीतिक दल का कोई व्यक्ति किसी जरूरतमंद की बात भी नहीं सुनेगा।’ यह भी कहा, ‘टाडा तब भी लगा दिया गया जब मुकदमे में अवस्थी जी पर कोई आरोप साबित नहीं हुए हैं। अटल जी की बातों का ही असर था कि पिताजी पर से ‘टाडा’ हटा लिया गया। 
संजय अवस्थी, पुत्र बद्रीप्रसाद अवस्थी
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