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लॉकडाउन से भंवर में उलझी मर्चेंट नेवी अफसरों के 250 से अधिक परिवारों की जिंदगी

Wed, 27 May 2020 01:01 PM IST
ishwar ashish रोली खन्ना/अमर उजाला, लखनऊ
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- फोटो : amar ujala
मर्चेंट नेवी के 250 अफसरों और कर्मचारियों के परिवारों की जिंदगी सांसत में हैं। वजह, लॉकडाउन के कारण उनके प्रियजन जहाजों पर महीनों से फंसे हैं। वह कहां हैं, किस हाल में हैं, रोज खबर भी नहीं मिलती। कोई दस महीने से तो कोई छह महीने से जहाज पर है। जबकि चार महीने से ज्यादा समुद्र के बीच रहना सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है। राजधानी में सीफेयरर्स की पत्नियों ने मिलकर एक मुहिम जस्टिस फॉर सेलर्स शुरू की है। इसमें वे लगातार अपने पति की घर वापसी की गुहार लगा रही हैं। इस मुहिम की शुरुआत और इससे जुड़े परिवारों की पीड़ा पर पेश है रिपोर्ट...
 
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शिवांश और कार्तिक - फोटो : amar ujala
मेरे पापा मेरे हीरो....     उन्हें वापस ले आओ
हमारे पापा हमारे हीरो...। शिवांश और कार्तिक  की कुछ इस तरह की तस्वीर तनु मिश्रा पति संदीप वर्मा को भेजकर उनका मनोबल बढ़ाती रहती हैं। तनु बताती हैं संदीप को गए छह महीने हो गए, जबकि चार महीने का ही कॉन्ट्रैक्ट था। कतर में शिप पर हैं। फ्लाइट नहीं होने से कतर से नहीं निकल पा रहे। समस्या ये भी है कि फ्लाइट की सुविधा दे भी दी जाए तो उनके रिलीवर का वहां पहुंचना जरूरी है। हम उन्हें सब ठीक होने का आश्वासन देकर हिम्मत देने की कोशिश करते हैं, पर हमारा मनोबल टूट रहा है। हम सरकार से मांग करते हैं कि इन बच्चों की खातिर उन्हें वापस लाने का प्रबंध किया जाए।

 
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- फोटो : amar ujala
हमें उनकी सेहत की चिंता है, मुश्किल हो रहा तनाव झेलना
अभिलाषा श्रीवास्तव सास-ससुर और नौ साल की बेटी के साथ गोमतीनगर में रहती हैं। पति मयंक श्रीवास्तव नवंबर से शिप पर हैं। अभी मैक्सिको में हैं, जुलाई तक साउथ कोरिया पहुंचेंगे। इसके बाद ही लौटने की कोई संभावना बनेगी। जहाज पर चार महीने से अधिक एडजस्ट करना मुश्किल होता है। पर यहां तो समय बढ़ता जा रहा है। मैं न तो बुजुर्ग माता-पिता को सांत्वना दे पा रही हूं, न बेटी को बता पा रही हूं कि पापा कब आएंगे। हमें उनकी सेहत की चिंता है कि वे कैसे खुद को मैनेज करेंगे, वो भी परिवार से दूर। कोई इसे समझे, कोई नोटिस करे और हमारी मदद करे, हम बस इतना ही चाहते हैं। 
 

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गोमतीनगर निवासी शिप्रा भदौरिया - फोटो : amar ujala
हम शिकायत नहीं कर रहे, बस मदद मांग रहे हैं
गोमतीनगर निवासी शिप्रा भदौरिया बताती हैं कि पति आशीष दस महीने पहले चीन से रवाना हुए थे। अब आस्ट्रेलिया पहुंच रहे हैं। वो हमसे कब मिल पाएंगे, न तो वे कुछ कह पा रहे हैं, न हमें कोई उम्मीद नजर आ रही है। मुझे अब आशीष के सेहत की भी चिंता हो रही है, क्योंकि शिप पर एक फर्स्ट एड बॉक्स ही होता है। बीते दिन एक अन्य शिप पर किसी की तबीयत खराब हुई, स्टोन का गंभीर दर्द उठा, वे आजतक पेन किलर पर हैं। हम कोई शिकायत नहीं कर रहे, बस मदद मांग रहे हैं।

व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर बनीं एक दूसरे का सहारा
शिप्रा बताती हैं कि मर्चेंट नेवी के अफसरों की पत्नियों का एक व्हाट्सएप ग्रुप है, जिसकी एडमिन वह खुद हैं। इसे बनाने का मकसद है एक-दूसरे के सुख-दुख का साझीदार बनना। इसी तरह कुछ और ग्रुप भी हैं। राजधानी में ही बड़ी संख्या में ऐसे परिवार हैं, जो अपनों की घर वापसी की राह ताक रहे हैं। इसी तरह राष्ट्रीय स्तर पर भी एक ग्रुप है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग जुड़े हैं। इस वक्त सात समंदर पार जहाज पर तैनात भारतीयों की संख्या 25,000 से अधिक है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : PTI
पीएम-सीएम करें सहायता
शिप्रा बताती हैं कि कुछ ट्वीट के जरिए हमें पता चला कि चार्टर्ड प्लेन से कुछ लोगों को लाने की व्यवस्था की जाएगी, लेकिन यह व्यवस्था सिर्फ विश्व के प्रमुख पोर्ट के लिए होगी। चार्टर्ड प्लेन महंगा है और लोग कोने-कोने में है, इसलिए लाना आसान नहीं होगा। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री चाहें तो सब संभव है।

दिक्कतों पर एक नजर
हफ्ते में दो-तीन बार ही परिवार से बात हो पाती है।
- समुद्र के बीच चार महीने की ड्यूटी का शेड्यूल इसीलिए होता है कि इससे अधिक एक इंसान शारीरिक व मानसिक रूप से झेल ही नहीं पाता है।
- परिवार से दूरी मानसिक तौर पर कमजोर कर देती है।
- महामारी के बीच परिवार की चिंता भी सताती है।
- कोई बीमार पड़ जाए तो इलाज की गारंटी नहीं होती है, इस चिंता में घुटा जा रहा परिवार।
- कोई आश्वासन भी नहीं मिल रहा कि कब तक हो सकेगी वापसी।
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