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किशोरावस्था में बच्चों के लिए सेक्स एजुकेशन जरूरी, अभिभावकों और स्कूलों को ध्यान देने की जरूरत: विशेषज्ञ

Thu, 07 May 2020 03:42 PM IST
निलेश कुमार लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सवाल है कि बच्चों की विकृत होती मानसिकता के आखिर कौन से कारण हो सकते हैं - फोटो : Amar Ujala/Pexels
इंस्टाग्राम पर पिछले कुछ महीनों से ब्वॉयज लॉकर रूम नाम से चल रहे ग्रुप में करीब 16-17 साल के लड़के अश्लील बातें कर रहे थे। टीनएजर्स यानी किशोर उम्र के छात्र न केवल लड़कियों और महिलाओं की गंदी तस्वीरें डालते थे, बल्कि उनका सामूहिक दुष्कर्म करने तक की बातें करते थे। किशोरों की बातचीत सार्वजनिक होने के बाद दिल्ली महिला आयोग ने स्वत: संज्ञान लिया और आयोग की आपत्ति के बाद दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई की। एक ओर इस घटना ने समाज को शर्मसार किया है तो वहीं दूसरी ओर बच्चों की परवरिश पर भी सवाल उठ रहे हैं। सवाल है कि बच्चों की विकृत होती मानसिकता के आखिर कौन से कारण हो सकते हैं। अमर उजाला ने इस विषय पर रिलेशनशिप काउंसलर और मनोवैज्ञानिक डॉ. शिवानी से बात की तो बच्चों की परवरिश और उनकी स्कूलिंग से लेकर मोबाइल और इंटरनेट पर उपलब्ध अश्लील कंटेंट तक कई सारे पहलू सामने आए।
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इंटरनेट पर पॉर्न वीडियो आसानी से उपलब्ध है - फोटो : Pexels
  • इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं पॉर्न वीडियो
बच्चों की विकृत होती मानसिकता के लिए सारथी काउंसेलिंग सर्विसेस की हेड डॉ. शिवानी बहुत सारे कारकों को जिम्मेवार मानती हैं। इस घटना को लेकर उन्होंने कहा कि यह बहुत ही शर्मनाक है। जिस तरह आजकल इंटरनेट पर पॉर्न वीडियो आसानी से उपलब्ध है और इसे बच्चे और किशोर दिलचस्पी के साथ देख रहे हैं, यही आदत उनकी मानसिकता को दूषित कर रही है। उन्होंने कहा कि बच्चे दुष्कर्म की वीडियो और मर्डर की वीडियो देख रहे हैं, ऐसी वीडियो उन्हें अंधकार में धकेलने के लिए ट्रिगर का काम कर रही हैं।
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मोबाइल पर अश्लील कंटेंट उपलब्ध हैं - फोटो : Pixabay
  • दुष्कर्म और मर्डर की वीडियो करती हैं 'ट्रिगर' का काम
दुष्कर्म के बारे में बातें करना और कथित तौर पर दुष्कर्म की योजना बनाना, आखिर किशोरों के दिमाग में चल रही ऐसी घिनौनी बातें आती कहां से है! क्या टीवी, सिनेमा, मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया की चकाचौंध के बीच भविष्य की पीढ़ी का नैतिक पतन हो रहा है? डॉ. शिवानी इसके पीछे अश्लील, हिंसक गेम और वेब सीरीज को भी जिम्मेवार बताती हैं। टीवी, मोबाइल वगैरह पर जिस तरह अश्लील कंटेंट उपलब्ध हो रहे हैं, इससे बच्चों की मानसिकता दूषित हो रही है। 

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किशोरावस्था में छात्रों का भटकाव होने की संभावना होती है - फोटो : Pexels
  • महिलाएं भी मनुष्य हैं, कोई यौन उत्पाद नहीं 
डॉ. शिवानी कहती हैं कि समाज में बहुत सारे लोग महिलाओं को ह्यूमन बिइंग यानी एक मनुष्य, एक इंसान के तौर पर नहीं, बल्कि सेक्शुअल ऑब्जेक्ट यानी यौन उत्पाद की तरह देखा जाता है। टीवी, सिनेमा, विज्ञापनों में भी उन्हें इसी तरह परोसा जाता है। किशोरावस्था में छात्रों का भटकाव होता है तो उनमें भी ऐसी सोच बनने लगती है। स्त्री का शरीर उनके लिए यौन कुंठा मिटाने का साधन नजर आता है। बच्चों के अंदर पनपती ऐसी सोच पर लगाम लगाना होगा। 
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डॉ. शिवानी कहती हैं कि रिलेशनशिप को लेकर बच्चों का झुकाव होने लगता है
  • किशोरावस्था में यौन उत्सुकता
बच्चों में उम्र के साथ विभिन्न तरह के हार्मोन भी बढ़ते हैं। डॉ. शिवानी कहती हैं कि किशोर होने के क्रम में स्त्री और पुरुषों की शारीरिक संरचना में जो बदलाव आते हैं, उनके बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ने लगती है। मन में उठ रहे इन सवालों के जवाब ढूंढने के लिए बच्चे पॉर्न की ओर मुड़ जाते हैं। इसमें उन्हें एक तरह का आनंद महसूस होने लगता है। सेक्स और रिलेशनशिप को लेकर अलग तरह की फैंटेसी की ओर बच्चों का झुकाव होने लगता है। 
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रिलेशनशिप और सेक्स को लेकर छात्रों को शिक्षित करने की जरुरत है - फोटो : Pexels
  • सेक्स एजुकेशन जरूरी
डॉ. शिवानी किशोर छात्रों के बीच सेक्स एजुकेशन की जरूरत पर जोर देते हुए कहती हैं कि रिलेशनशिप और सेक्स को लेकर छात्रों को शिक्षित करने की जरुरत है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने कुछ समय पहले इस दिशा में प्रयास भी किए, लेकिन 13 राज्यों ने विरोध कर दिया। आजकल माता-पिता अपने बच्चों को समय नहीं दे पा रहे हैं। वे ध्यान नहीं दे पा रहे हैं कि गलत चीजें बच्चें कहां से सीख रहे हैं, किन चरित्रों को बच्चे कॉपी कर रहे हैं। अपने काम निबटा कर बच्चा अपने कमरे में क्या कर रहा है, इसपर ध्यान देने की जरूरत है।
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अगर मां-बाप अपने बच्चों के साथ संवाद नहीं करेंगे तो कौन करेगा? - फोटो : Pexels
  • बच्चों के साथ संवाद जरूरी
भारतीय समाज में सेक्स को लेकर कई तरह की वर्जनाएं यानी टैबू हैं। घर-परिवार में बच्चों के मुंह से गलती से भी 'सेक्स' शब्द निकल जाए तो उसे डांट और मार पड़ जाती है। डॉ. शिवानी कहती हैं कि अगर मां-बाप अपने बच्चों के साथ संवाद नहीं करेंगे तो कौन करेगा? सेक्स और रिलेशनशिप के बारे में बच्चों की उत्सुकता दूर करनी चाहिए। 'सेक्स न करें' की जगह 'सुरक्षित सेक्स' के बारे में व्यस्क होने से पहले उन्हें जानकारी होनी चाहिए। बच्चों के साथ संवाद का स्पेस बनाएं, जहां उन्हें यौन विषयों पर अपने सवालों के जवाब मिल पाए। घर में जवाब नहीं मिलने पर वे बाहर इसका जवाब तलाशेंगे। 
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बच्चों की फोन एक्टिविटी समय-समय पर चेक करते रहना भी जरूरी है
  • बच्चों की ऑनलाइन एक्टिविटी की निगरानी जरूरी
बॉयज लॉकर रूम जैसी घटना पर डॉ. शिवानी कहती हैं कि इसके लिए केवल बच्चों को दोषी ठहराने की बजाय हमें सारे पहलुओं पर सोचना होगा। कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल और इंटरनेट पर बच्चे कितना समय बिताते हैं, क्या-क्या देखते हैं, इसकी पहरेदारी करना मुश्किल है। ऐसे में डॉ. शिवानी कुछ सॉफ्टवेयर और एप्लिकेशन की जरूरत बताती हैं। पैरेंट्स कंट्रोल डिवाइस एप, फैमिली जोन एप्लिकेशन, ओपन स्मार्टफोन एक्सेस पर पाबंदी वाले अन्य एप सहायक हो सकते हैं। साथ ही बच्चों की फोन एक्टिविटी समय-समय पर चेक करते रहना भी जरूरी है। किशोरावस्था में बच्चों के भटकाव की संभावना रहती है और इससे बचने के लिए डॉ. शिवानी बच्चों से संवाद को सबसे जरूरी बताती हैं। 

(नोट: तस्वीरें प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल की गई हैं।)
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