बीमारियों और अस्पताल का जिक्र आते ही दिमाग में जो पहली तस्वीर आती है, वो अक्सर खांसते-छींकते बुखार या फिर अस्पताल के बिस्तर पर पड़े मरीज की होती है।
क्या आपके जेहन में डिप्रेशन के किसी मरीज की तस्वीर उभरी, जो काउंसलिंग के लिए साइकॉलोजिस्ट के पास आया हो या बाइपोलर डिसॉर्डर का कोई मरीज जो सायकाइट्रिस्ट के कमरे के बाहर अपने नंबर का इंतजार कर रहा हो?
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क्या हैं मानसिक रोग के लक्षण? कब देते हैं शॉक थेरेपी?
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मानसिक रोग
मेंटल हेल्थकेयर बिल-2016
अभी कुछ दिनों पहले ही लोकसभा में मेंटल हेल्थ केयर बिल-2016 पास हुआ, जो मानसिक बीमारियों से पीड़ित लोगों को सुरक्षा और इलाज का अधिकार देता है। यह कानून अपने आप में काफी प्रोग्रेसिव है, जो मरीजों को सशक्त बनाता है।
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बिल के प्रावधानों के मुताबिक, अब मानसिक बीमारियों को भी मेडिकल इंश्योरेस में कवर किया जाएगा। कोई भी स्वस्थ व्यक्ति अपना नॉमिनी चुन सकता है, जो मानसिक तकलीफ की हालत में उसकी देखभाल करेगा। गंभीर मानसिक परेशानी से गुजर रहे व्यक्ति को परिवार से दूर या अलग-थलग नहीं किया जा सकेगा न ही उसके साथ किसी तरह की जबरदस्ती की जा सकेगी।
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मानसिक रोग
अपराध के दायरे से बाहर खुदकुशी
सबसे जरूरी बात, अब खुदकुशी की कोशिश को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया गया है यानी अपनी जिंदगी खत्म करने की कोशिश करने वालों को जेल नहीं भेजा जाएगा बल्कि उन्हें डॉक्टरी मदद दिलाई जाएगी। आखिर हम मानसिक परेशानियों को नकारने की कोशिश क्यों करते हैं?
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क्या दिमाग हमारे शरीर का हिस्सा नहीं है? सवाल सीधा है लेकिन जवाब उलझे हुए। हमने बचपन से कभी इन बीमारियों के बारे में बात होते सुना ही नहीं, किताबों में भी नहीं पढ़ा। हमने बस फिल्मों में देखा कि कोई पागल लड़की है, जिसे पागलखाने में कैद कर दिया गया है, उसके बाल छोटे कर दिए गए हैं, उसे इलेक्ट्रिक शॉक दिया जा रहा है और वह चीख रही है।
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मानसिक रोग
विद्यासागर इंस्टिट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ ऐंड न्यूरोसाइंसेज (VIMHANS) की सायकाइट्रिस्ट डॉ. सोनाली बाली कहती हैं, 'लोगों के मन में दवाइयों को लेकर भी बहुत सी गलत धारणाएं हैं। उन्हें लगता है कि उनके दिमाग में केमिकल ठूंसे जा रहे हैं या उन्हें दवाइयों का आदी बनाया जा रहा है जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है।'
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आपने किसी ऐसे इंसान को देखा होगा, जो अपने आप से बातें करता रहता है या फिर कोई ऐसा जो हमेशा मरने की बातें करता है। हर छोटी-छोटी बात पर रो देता है। आप उन खुशमिजाज और मस्तमौला लोगों से भी मिले होंगे, जिनकी खुदकुशी की खबर पर आपको यकीन नहीं होता।
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क्या हैं मानसिक बीमारी के लक्षण?
VIMHANS में प्रैक्टिस करने वाली साइकॉलजिस्ट डॉ. नीतू राणा कहती हैं, 'इन सभी चीजों को रोका जा सकता है, हालात संभाले जा सकते हैं, इलाज मुमकिन है, जरूरत है बीमारियों को पहचानने की।
- अगर आपको याद नहीं कि आप आखिरी बार खुश कब थे।
- बिस्तर से उठने या नहाने जैसी डेली रुटीन की चीजें भी आपको टास्क लगती हैं।
- आप लोगों से कटने लगे हैं।
- आप खुद से नफरत करते हैं और अपने आप को खत्म कर लेना चाहते हैं।
अगर आप इन बातों के अलावा गूगल पर खुदकुशी के तरीके सर्च करते हैं तो आपको तुरंत मदद लेनी चाहिए।'
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चाइनीज एसी
कैसे होगा इलाज?
आपका इलाज सिर्फ थेरेपी या काउंसलिंग से होगा या फिर दवाइयों की जरूरत भी पड़ेगी, इसका फैसला डॉक्टर करेगा। अगर बीमारियां गंभीर हैं, मसलन किसी को अजीबों-गरीब आवाजें सुनाई पड़ रही हैं, वह कुछ ऐसा देख या सुन रहा है जो दूसरे नहीं या अगर कोई खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहा है तो ऐसे में परिवार और दोस्तों की जिम्मेदारी है कि वे उसे डॉक्टर के पास ले जाएं क्योंकि ऐसी हालत में मरीज कभी खुद स्वीकार नहीं करेगा कि वह बीमार है।
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डिप्रेशन में इंसान क्यों नहीं रह पाता है खुश?
एक गलत धारणा यह भी है कि डिप्रेशन या दिमागी तकलीफें सिर्फ उसे ही होती हैं, जिसकी जिंदगी में कोई बहुत बड़ा हादसा हुआ हो या जिसके पास दुखी होने की बड़ी वजहें हों। लोग अक्सर पूछते हैं, 'तुम्हें डिप्रेशन क्यों है? क्या कमी है तुम्हारी लाइफ में?' यह पूरी तरह से गलत है।
डिप्रेशन के दौरान इंसान के शरीर में खुशी देने वाले हार्मोंस जैसे कि ऑक्सिटोसीन का बनना कम हो जाता है। यही वजह है कि डिप्रेशन में आप चाहकर भी खुश नहीं रह पाते। इसे दवाइयों, थेरेपी और लाइफस्टाइल में बदलाव लाकर बेहतर किया जा सकता है।
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कब दी जाती है शॉक थेरेपी?
रही बात फिल्मों में दिखाई जाने वाली शॉक थेरेपी की, तो डॉ. नीतू मानती हैं, 'इसमें हायतौबा मचाने की जरूरत नहीं है। शॉक थेरेपी तब दी जाती है जब मरीज पर दवाइयों का असर न हो रहा हो। अगर कोई अपनी जान लेने पर तुला है और उसे तुरंत काबू में लाना पड़े, तब ही इसकी जरूरत पड़ सकती है।'
डॉ. सोनाली कहती हैं, 'हम मानसिक बीमारियों से ग्रसित गर्भवती महिलाओं को भी शॉक थेरेपी देते हैं, क्योंकि कुछ दवाइयों के साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं। इससे पता चलता है कि यह पूरी तरह सेफ है।'