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प्लेटोनिक लव यानी अफलातूनी प्यार क्या और कैसे होता है, प्लेटो के दर्शन और टैगोर की प्रेम कहानी से क्या है संबंध?

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प्रेम जीवन के सुखद एहसासों में से एक है - फोटो : Pixabay
श्वेता और केशव जब 12वीं में थे, तभी से लगाव महसूस करते थे। एक-दूसरे से कोई अपेक्षा नहीं थी, कोई स्वार्थ नहीं। बस मिलना, साथ रहना, बातें करना अच्छा लगता था। साथ—साथ ग्रेजुएशन पूरा किया। एक साथ कॉलेज और कोचिंग सेंटर में आते-जाते। इसके बाद दोनों की नौकरी लग गई और श्वेता की शादी भी तय हो गई। श्वेता ने फोन पर केशव को यह बात बताई। उनके बीच प्रेम तो था, लेकिन निस्वार्थ था। आज भी दोनों अच्छे अंतरंग दोस्त हैं। 

दरअसल, प्रेम जीवन के सुखद एहसासों में से एक है। प्रेम में आप अपने पार्टनर से क्या चाहते हैं? आकर्षण, चाहत, रोमांस, शादी, घर, परिवार और बहुत कुछ। पर क्या आपने कुछ ऐसे रिश्ते देखे हैं, ऐसा प्यार देखा है, जिसमें बहुत गहरा लगाव, निस्वार्थ भाव, अटूट विश्वास, समझदारी, ईमानदारी जैसे जज्बातों से ज्यादा और कोई स्वार्थ नहीं होता। 
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प्लेटोनिक प्रेम निष्काम होता है - फोटो : Pixabay
महान दार्शनिक प्लेटो के नाम से जाना जाने वाला प्लेटोनिक प्रेम निष्काम होता है। साधारण शब्दों में इसे अफलातूनी प्यार कहा जाता है। मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक इस अहसास को, इस अनुभूति को व्यक्त करना बहुत मुश्किल है। इसे महज आकर्षण नहीं कहा जा सकता, क्योंकि आकर्षण समय के साथ कम हो जाता है, लेकिन प्लेटोनिक प्रेम अनाम रिश्तों के बावजूद हमारी मधुर स्मृतियों में संचित रहता है। समझना मुश्किल होता है कि आखिर यह कैसा रिश्ता है? किसी एक के ही प्रति पनपता है। वक्त के साथ यह बढ़ता ही है घटता नहीं। कब, कहां, कौन, कैसे किसी मन को लुभाने लगता है। रोमांस और वासना से दूर आखिर यह कैसा रिश्ता होता है! 
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Rabindranath Tagore - फोटो : social media
देश का राष्ट्रगान लिखने वाले दार्शनिक, कवि, एशिया के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता रविंद्रनाथ टैगोर ने प्रेम पर भी खूब सारी रचनाएं लिखी। उनमें से ही एक मशहूर रचना है, गीतांजलि। साल 1914 में अर्जेंटीना में एक लड़की ने उनकी इस रचना का फ्रेंच में पाठ किया। 25 साल की यह मशहूर नारीवादी लेखिका विक्टोरिया ओकैम्पो टैगोर की कविताओं की दीवानी हो गईं। इसके 10 साल बाद 1924 में टैगोर जब पेरू की यात्रा के दौरान बीमार पड़े तो उन्हें ब्यूनस आयर्स में रुकना पड़ा था। कई भाषाओं की जानकार ओकैम्पो से उनकी मुलाकात हुई, उनकी बुद्धिमता से प्रभावित हुए और उन्हें अपना प्रेरणास्रोत माना। टैगोर और ओकैम्पो के बीच जो पवित्र और अप्रतिम प्रेम था, उसे प्लेटोनिक लव कहा गया। विद्वानों ने बौद्धिक प्रेम और आध्यात्मिक प्रेम के रूप में भी इसका विवरण किया है। 

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Rabindranath Tagore with Ocampo - फोटो : Facebook
टैगोर ओकैम्पो से इतने प्रभावित हुए कि उनको समर्पित कविताएं भी लिखीं। उनकी ये रचनाएं पूर्वी नाम से प्रकाशित हुई हैं। टैगोर अपने जीवन में ओकैम्पो से महज दो बार ही मिले। दोनों की दूसरी और अंतिम मुलाकात साल 1930 में हुई। टैगोर जबतक जीवित रहे, दोनों के बीच पत्र व्यवहार चलता रहा। वे ओकैम्पो को प्यार से विजोया बुलाते थे। दोनों के पत्रों में उनके बौद्धिक प्रेम और प्रगाढ़ रिश्तों की साफ झलक मिलती है। शारीरिक आकर्षण से दूर दोनों का यह विशुद्ध आध्यात्मिक एहसास दो अलग देशों और संस्कृति के बीच मिसाल है। 
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Saheb Bibi aur Ghulam - फोटो : Social Media
प्रसिद्ध उपन्यासकार बिमल मित्रा की बांग्ला उपन्यास पर साल 1962 में आई फिल्म साहब, बीबी और गुलाम आपने देखी होगी और नहीं देखी तो देखनी चाहिए। इस फिल्म में जमींदार घर की छोटी बहू(मीना कुमारी) और भूतनाथ(गुरुदत्त)के बीच ऐसा ही रिश्ता होता है, जिसमें शरीर की चाहत से परे आत्मिक प्रेम दिखता है। एक दृश्य में छोटी बहू से शराब की गिलास छीनते हुए भूतनाथ उनका हाथ छू लेता है, तो वह बिफर जाती हैं। डांट लगाती है कि पराई स्त्री का हाथ क्यों छुआ! इसे भी प्लेटोनिक लव कहा जाए तो गलत नहीं होगा। 
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प्लेटोनिक लव - फोटो : Pixabay
प्लेटोनिक लव दैहिक या शारीरिक आकर्षण से बना अनैतिक रिश्ता नहीं है। इसमें स्वार्थ नहीं होता, यह नफा या नुकसान नहीं सोचता। बस एक-दूसरे की प्रगति, विकास और अच्छे भविष्य की कामना रहती है। यह प्रेम निष्पाप और निष्कलंक होता है। वर्तमान समय में हमारा समाज अक्सर इस प्रेम को समझ नहीं पाता है। यहां तक कि प्लेटोनिक लव में रहने वाले भी कई बार खुद को नहीं समझ पाते।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
अनैतिक रिश्तों की भीड़ में जब प्लेटोनिक लव को भी नासमझी में सामान्य प्यार समझ लिया जाता है, तो रिश्तों का बिखराव होने लगता है। दरअसल यह खूबसूरत भाव किसी के भी प्रति कभी भी पैदा हो सकता है। वह आपका कोई रिश्तेदार या दोस्त हो सकता है। कोई परिचित हो सकता है या फिर अजनबी। आपको बस इस अलौकिक अनुभूति को पहचानना आना चाहिए। 

नोट: यह आलेख मनोवैज्ञानिक और काउंसलर डॉ. चित्रलेखा से बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है। 
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