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भावनाएं व्यक्त करना सिखाएं
'लड़के रोते नहीं, कमजोर हो क्या, लड़कियों की तरह डर क्यों रहे हो' आदि बाते बोलकर अक्सर बेटे को उनकी भावनाएं व्यक्त करने से रोका जाता है। बचपन से बेटे को सिखाते हैं कि रोना, डरना कमजोरी है। उसे महसूस कराया जाता है कि यह कमजोरी बेटी में हो सकती है लेकिन बेटे में नहीं। बचपन में लड़के को भावनाएं दबाना सिखाकर माता पिता उन्हें कठोर बना देते हैं। इस तरह की सीख उन्हें दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए प्रेरित करती है। वह इमोशनली स्ट्रॉन्ग नहीं बनते बल्कि भावनात्मक रूप से बिगड़ जाते हैं। बेटों को दर्द या दुख जाहिर करने पर रोके नहीं, बल्कि अपनी भावनाएं व्यक्त करना सिखाएं। इस से वह दूसरों की भावनाओं की भी कद्र करेंगे और किसी दूसरे के रोने या दुख को महसूस कर पाएंगे।