प्रतीकात्मक तस्वीर
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‘टेक मी ऐज आई एम’
इतनी मुश्किलों के बाद भी भारत में बाइसेक्शुअल लड़कियां धीरे-धीरे ही सही मगर खुलकर बाहर आने लगी हैं। खासकर, जून के इस महीने (प्राइड मंथ) में कई लड़कियों ने सोशल मीडिया पर बेहिचक अपनी सेक्शुअलिटी को कबूला है। जून महीने को एलजीबीटी समुदाय ‘प्राइड मंथ’ के तौर पर मनाता है। इस दौरान वो अपने संघर्षों, इच्छाओं और उपलब्धियों के बारे में बात करते हैं। यही वजह है कि इस समय युवा बाइसेक्शुअल लड़कियां भी कई सामाजिक बेड़ियों को तोड़ती हुई नजर आ रही हैं। वो मांग कर रही हैं कि उनकी बाइसेक्शुअलिटी को स्वीकार किया जाए, वो जैसी हैं, उन्हें वैसे ही स्वीकार किया जाए।
सितंबर, 2018 में जब भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक सम्बन्धों को अपराध ठहराने वाली आईपीसी की धारा 377 को निरस्त कर दिया था। तब तत्कालीन सीजेआई जस्टिस दीपक मिश्रा ने अदालत का फैसला पढ़ते हुए जर्मन लेखक योहन वॉफगैंग को याद किया था। जस्टिस मिश्रा ने कहा था-आई एम वॉट आई एम, सो टेक मी ऐज आई एम (I am what I am, so take me as I am)।