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LGBT: बाइसेक्शुअल बताते ही क्यों बढ़ जाती है लड़कियों की मुश्किलें?

Tue, 30 Jun 2020 02:09 PM IST
नवनीत राठौर लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
आइसलैंड की मशहूर पॉप गायिका बियर्क ने एक बार कहा था, “मुझे लगता है कि पुरुष और महिला में से एक को चुनना केक और आइसक्रीम में से किसी एक को चुनने जैसा है। इनके इतने अलग-अलग तरह के फ्लेवर उपलब्ध होने के बावजूद सबको न आजमाना बेवकूफी होगी।”

बियर्क ने जो कहा वो कुछ लोगों के लिए थोड़ा 'बेमतलब' हो सकता है लेकिन यहां उनका इशारा ‘बाइसेक्शुअलिटी’ की तरफ था। जो लोग पुरुषों और महिलाओं दोनों से यौन आकर्षण महसूस करते हैं उन्हें बाइसेक्शुअल कहा जाता है। जब हम एलजीबीटीक्यूआई समुदाय की बात करते हैं तो इसमें शामिल ‘बी’ का मतलब बाइसेक्शुअल होता है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
एक लड़की का बाइसेक्शुअल होना
दिल्ली में रहने वाली 26 साल की गरिमा भी खुद को बाइसेक्शुअल मानती हैं। वो लड़कियों और लड़कों से समान यौन आकर्षण महसूस करती हैं और दोनों को डेट कर चुकी हैं। गरिमा बताती हैं, “जब मैंने पहली बार एक लड़की को किस किया तो मुझे वो लम्हा उतना ही खूबसूरत लगा जितना पहली बार लड़के को किस करने पर लगा था। मैंने सोचा कि अगर ये इतना सहज है तो लोग इसे अप्राकृतिक क्यों कहते हैं!”

गरिमा ने खुद को तो बड़ी आसानी और निडरता के साथ स्वीकार कर लिया था लेकिन इसे दूसरों को समझाना उनके लिए उतना ही मुश्किल था। वो कहती हैं, “हमारे समाज में लड़कियों का अपनी सेक्शुअलिटी जाहिर करना अपने-आप में ही काफी मुश्किल होता है। आपसे ऐसे बर्ताव करने की उम्मीद की जाती है, जैसे आपमें यौन इच्छाएं ही नहीं हैं। ऐसे में आपके लड़के और लड़की दोनों को पसंद करने की बात तो लोग बिल्कुल स्वीकार नहीं कर पाते।”
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
गरिमा को लड़कियां किशोरावस्था से ही अच्छी लगती थीं लेकिन वो कभी इस बारे में ज्यादा सोच नहीं पाईं। वो कहती हैं, “हमारे आस-पास के माहौल में किसी और सेक्शुअलिटी का न तो कोई जिक्र होता है और न कोई चित्रण। फिल्मों और कहानियों से लेकर विज्ञापनों तक, हर जगह सिर्फ एक महिला और पुरुष को ही साथ दिखाया जाता है। ऐसे में हम ये मान लेते हैं कि सिर्फ वही सही है और सिर्फ वही नॉर्मल।”

कॉलेज के फर्स्ट इयर में आते-आते गरिमा एलजीबीटीक्यू समुदाय के बारे में काफी कुछ पढ़ और समझ चुकी थीं। उन्हें ये भी पता चल चुका था कि लड़कों और लड़कियों दोनों से आकर्षित होना नॉर्मल है। इसी बीच अपने पहले बॉयफ्रेंड से ब्रेकअप होने के बाद उन्होंने एक लड़की को डेट करना शुरू किया और तब जाकर वो अपनी सेक्शुअलिटी को स्वीकार कर पाईं। मगर गरिमा फिर दुहराती हैं कि एक संकुचित समाज में किसी लड़की का बाइसेक्शुअल पहचान के साथ जीना आसान नहीं है।

बाहरी दुनिया तो दूर, खुद एलजीबीटी समुदाय के भीतर बाइसेक्शुअल लोगों को लेकर कई तरह की शंकाएं और ग़लत अवधारणाएं हैं। नतीजन, उन्हें समुदाय के भीतर भी कई तरह के भेदभाव का शिकार होना पड़ता है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
वफादारी और चरित्र पर सवाल
गरिमा कहती हैं कि एलजीबीटी समुदाय के बहुत से लोगों को भी ये लगता है कि बाइसेक्शुअल लोग रिश्ते में वफादार नहीं होते। लोग मानते हैं कि बाइसेक्शुअल लोगों को पुरुषों और महिलाओं दोनों से आकर्षण होता है इसलिए वो अपनी सुविधा के हिसाब से रिश्ते तय करते हैं।

उन्होंने बताया, “आम तौर पर लेस्बियन लड़की किसी बाइसेक्शुअल लड़की के साथ रिश्ते में नहीं आना चाहती क्योंकि उसे लगता है कि बाइसेक्शुअल लड़की उसे डेट जरूर करेगी लेकिन जब शादी करने या जिंदगी भर साथ निभाने की बात आएगी तो वो अपनी सुविधा और समाज के उसूलों के मुताबिक किसी लड़के का हाथ थाम लेगी। ऐसा ही कुछ बाइसेक्शुअल लड़कों के बारे में भी सोचा जाता है।”

इतना ही नहीं, बाइसेक्शुअल लोगों को कई बार ‘लालची’ और ऐसे व्यक्ति के तौर पर देखा जाता है जो रिश्ते में कमिटमेंट नहीं करना चाहते, किसी एक जगह टिकना नहीं चाहते लेकिन डेट सबको करना चाहते हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
गरिमा कहती हैं, “हमसे ये भी कहा जाता है कि हम अपनी सेक्शुअलिटी के लेकर भ्रमित हैं और ये महज एक दौर है जो बीत जाएगा। हम जैसे हैं, हमें वैसे स्वीकार नहीं किया जाता बल्कि हमेशा शक भरी निगाहों से देखा जाता है।” बाइसेक्शुअल लड़कियों को पुरुष वर्ग कई बार महज सेक्शुअल फैंटेसी से जोड़कर देखता है।

गरिमा बताती हैं, “मैं अपनी सेक्शुअलिटी के बारे में खुलकर बात करती हूं और इसी वजह से लोग मेरे बारे में कई धारणाएं गढ़ लेते हैं। लड़के मुझे सोशल मीडिया पर भद्दे मैसेज भेजते हैं। शायद उन्हें लगता है कि बाइसेक्शुअल लड़की किसी के भी साथ सोने को तैयार हो जाएगा। वो सहमति और पसंद-नापसंद के बारे में बिल्कुल नहीं सोचते।”
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
बाइसेक्शुअलिटी को नजरअंदाज किया जाना
फिल्ममेकर और एलजीबीटी राइट्स एक्टिविस्ट सोनल ज्ञानी (32 साल) का मानना है कि एलजीबीटी समुदाय के भीतर लोगों पर किसी न किसी रूप में ये दबाव होता है कि या तो वो खुद को गे मानें या लेस्बियन।

सोनल कहती हैं कि बाइसेक्शुअलिटी के बारे में बात करने में लोग बहुत ज्यादा सहज नहीं होते। इसीलिए कई बार बाइसेक्शुअल लोग दबाव के कारण खुद को गे या लेस्बियन बताते हैं। समुदाय के भीतर बाइसेक्शुअलिटी को यूं जानबूझकर नजरअंदाज करने को जेंडर स्टडी की भाषा में बाइसेक्शुअल इरेजर(Bisexual erasure) कहते हैं। खुद को बाइसेक्शुअल मानने वाली सोनल कहती हैं कि एलजीबीटी समुदाय के लोग भी इसी समाज का हिस्सा हैं और वो भी भेदभाव की भावना से मुक्त नहीं हैं।

वो कहती हैं, “मीडिया और पॉपुलर कल्चर में बाइसेक्शुअलिटी को ना के बराबर जगह मिलती है। समलैंगिकता के मुद्दे पर अब धीरे-धीरे फिल्में और वेबसिरीज बनने लगी हैं लेकिन बाइसेक्शुअलिटी अभी इस चर्चा से बहुत दूर है।”
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
सोनल अपना अनुभव साझा करते हुए बताती हैं कि कैसे बहुत बार उन्हें अपनी महिला पार्टनर के साथ देखकर लेस्बियन बता दिया गया जबकि वो खुले तौर पर खुद को बाइसेक्शुअल बताती हैं।

वो कहती हूं, “कई अखबारों और चैनलों ने मुझे लेस्बियन लिखा जबकि मैंने उन्हें बार-बार बताया कि मैं बाइसेक्शुअल हूं। अगर मैं किसी पुरुष के साथ दिखूंगी तो वो मुझे स्ट्रेट समझेंगे और महिला के साथ नजर आने पर मुझे लेस्बियन कहा जाएगा। मेरी बाइसेक्शुअलिटी को कहीं न कहीं नजरअंदाज कर दिया जाता है।”

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixaby
बाइसेक्शुअल मतलब पॉर्न और फैटेंसी नहीं
सोनल का मानना है किसी लड़की के लिए खुद की बाइसेक्शुअल पहचान को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना बहुत साहस भरा कदम होता है। वो कहती हैं, “कई बार लोग बाइसेक्शुअल लड़कियों को पॉर्न से जोड़कर देखते हैं और उनके चरित्र पर सवाल उठाते हैं। ऐसे में ये लड़कियों की सुरक्षा से जुड़ा मसला भी बन जाता है। यही वजह है कि बाइसेक्शुअल लड़कियां अब भी खुलकर सामने नहीं आ पातीं।''

युवा क्वियर एक्टिविस्ट धर्मेश चौबे एक और महत्वपूर्ण बात की ओर ध्यान दिलाते हैं। वो मानते हैं कि समाज बड़ी चतुराई से बाइसेक्शुअल पुरुषों और महिलाओं की यौनिकता को अपनी सुविधा के हिसाब से और अलग-अलग दलीलें देकर खारिज करने की कोशिश करता है।

धर्मेश कहते हैं, “बाइसेक्शुअल लड़कियों के बारे में ये माना जाता है कि वो स्ट्रेट ही हैं, बस थोड़ा ‘सेक्शुअल एडवेंचर’ कर रही हैं। वहीं, बाइसेक्शुअल पुरुषों के बारे में माना जाता है कि वो गे हैं लेकिन अपनी समलैंगिकता छिपाने के लिए बाइसेक्शुअल होने के बहाना कर रहे हैं। इसका मतलब ये हुआ कि पितृसत्तात्मक समाज में औरतों की यौनिकता कुछ खास मायने नहीं रखती। कुल मिलाकर उनसे यही उम्मीद की जाती है कि वो पुरुषों की इच्छाओं का खयाल रखें।”
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
‘टेक मी ऐज आई एम’
इतनी मुश्किलों के बाद भी भारत में बाइसेक्शुअल लड़कियां धीरे-धीरे ही सही मगर खुलकर बाहर आने लगी हैं। खासकर, जून के इस महीने (प्राइड मंथ) में कई लड़कियों ने सोशल मीडिया पर बेहिचक अपनी सेक्शुअलिटी को कबूला है। जून महीने को एलजीबीटी समुदाय ‘प्राइड मंथ’ के तौर पर मनाता है। इस दौरान वो अपने संघर्षों, इच्छाओं और उपलब्धियों के बारे में बात करते हैं। यही वजह है कि इस समय युवा बाइसेक्शुअल लड़कियां भी कई सामाजिक बेड़ियों को तोड़ती हुई नजर आ रही हैं। वो मांग कर रही हैं कि उनकी बाइसेक्शुअलिटी को स्वीकार किया जाए, वो जैसी हैं, उन्हें वैसे ही स्वीकार किया जाए।

सितंबर, 2018 में जब भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक सम्बन्धों को अपराध ठहराने वाली आईपीसी की धारा 377 को निरस्त कर दिया था। तब तत्कालीन सीजेआई जस्टिस दीपक मिश्रा ने अदालत का फैसला पढ़ते हुए जर्मन लेखक योहन वॉफगैंग को याद किया था। जस्टिस मिश्रा ने कहा था-आई एम वॉट आई एम, सो टेक मी ऐज आई एम (I am what I am, so take me as I am)।
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