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विनेश फोगाट: मुफलिसी के बीच पली-बढ़ीं, कुश्ती में बनाया अपना मुकाम

Wed, 05 Feb 2020 09:24 AM IST
नवनीत राठौर लाइफस्टाइल डेस्क,अमर उजाला,नई दिल्ली
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विनेश फोगाट - फोटो : social Media
90 के दशक के बॉलीवुड गानों की धुन पर वार्म-अप करती छोटे-छोटे बालों वाली युवा महिला खिलाड़ी। कुश्ती के दांव पेच से पहले ये पहलवान खुद को तैयार कर रही थीं। लखनऊ के इनडोर स्टेडियम का ये नजारा अपने आप में बहुत कुछ बयां कर रहा था। जनवरी की एक सर्द सुबह हम लखनऊ में महिला पहलवान विनेश फोगाट से मिलने पहुंचे थे। विनेश सुबह-सुबह यहां पूरे जोशो-खरोश से ट्रेनिंग में लगी हुई थी।

हमें देखकर वो हल्के से मुस्कुराईं, हाथ हिलाया और फिर तल्लीनता से प्रैक्टिस में लग गईं, कोच की एक-एक बात को ध्यान से सुनते हुए- मानो अगले मैच की हार-जीत का फैसला इसी पर टिका हुआ है। बीच में बस वो अपने पंसदीदा गाने लगाने के लिए रुकती थी- कुछ पंजाबी और कुछ हिंदी। उस दिन की थीम थी: उदास लव सॉन्ग्स।

ये 25 अगस्त 1994 को हरियाणा के बलाली गांव में जन्मी एक ऐसी महिला खिलाड़ी की कहानी है जो अपनी कड़ी मेहनत, हिम्मत, हौसले के बूते पर अब दुनिया की सबसे बेहतरीन पहलवानों में गिनी जाती है। करीब तीन घंटे की ट्रेनिंग के बाद विनेश इंटरव्यू के लिए मैट पर बैठते हुए कहती हैं कि पहलवानी करना तो उनकी किस्मत में शायद पहले से ही लिखा हुआ था।
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विनेश फोगाट
'गांव में निक्कर पहनकर प्रैक्टिस करते थे'
विनेश का इशारा अपने ताऊ महावीर फोगाट की ओर था। अपने शुरुआती दिनों के बारे में विनेश ने बताया, "मेरे ताऊजी खुद भी एक पहलवान थे। मेरे दादा जी भी पहलवान थे। जब हम बच्चे थे, तभी ताऊजी ने ठान लिया था घर की लड़कियों को पहलवानी सिखानी है। मैं तो सिर्फ छह साल की थी।" गीता और बबीता महावीर फोगाट की बेटियां थीं और विनेश उनकी भतीजी। ये उतना आसान नहीं था।

विनेश बताती हैं, "20 साल पहले हरियाणा के गांव में लड़कियों को कुश्ती सिखाने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। लोगों की सोच पुरुषवादी और रूढ़िवादी थी। लोगों ने ताऊजी को बहुत भला-बुरा कहा। हम बहनों के बाल छोटे-छोटे थे, लड़कों की तरह। हम निक्कर पहनकर गांव में प्रेक्टिस करने जाती थीं। पड़ोस की औरतें मां से आकर बोलती थीं कि अपनी बेटी को कहो कम से कम फुल पैंट पहनकर निकले। शुरू-शुरू में ये सब सुनकर मां को भी शर्म आती थी।" बात करते-करते विनेश के चेहरे के भाव बदल जाते हैं।
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विनेश फोगाट
'भाई, ये ओलंपिक कौन है?'
बात जारी रखते हुए विनेश हरियाणवी ठसक से बताती हैं, "पर मैं किसी की बात नहीं सुनती थी और पलट कर जवाब देती थी। मां से कहती कि उन्हें कहो कि ज्यादा दिक्कत है तो अपनी बेटियों की पहनवा लें। मेरे कपड़ों पर कमेंट न करें। ताऊजी की ट्रेनिंग से हमारे अंदर ये बात घर चुकी थी कि हम किसी से कम नहीं हैं।" जूझने और भिड़ जाने की इसी क्षमता ने विनेश को बड़े मुकाबलों में सफलता दिलवाई है लेकिन शुरुआती संघर्ष को विनेश भूली नहीं है।

वो बताती हैं, "जब बच्चे थे तो शुरू-शुरू में तो एक-दो महीने बहुत अच्छा लगा जब ताऊजी कुश्ती के लिए ले जाते। खेलना किस बच्चे को अच्छा नहीं लगता? धीरे-धीरे उन्हें लगना लगा कि इन लड़कियों में वाकई पहलवान बनने का दम है। उसके बाद हमारी कड़क वाली ट्रेनिंग शुरू हो गई। हमें सुबह साढ़े तीन बजे उठना पड़ता। ट्रेनिंग कितने घंटे चलेगी ये तय नहीं होता था। अगर आज के बच्चों को ऐसी कड़ी ट्रेनिंग करनी पड़े तो वो पहले ही दिन भाग जाएं।"

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विनेश फोगाट - फोटो : सोशल मीडिया
विग्नेश बताती हैं, "अगर कोई गलती हुई तो ट्रेनिंग और खिंच जाती और जो जबरदस्त वाली मार पड़ती वो अलग। इसके बाद हम स्कूल जाते। क्लास में तो हम सोते ही थे बस। तब जिंदगी का मतलब था: कुश्ती करो, खाओ और चुपचाप सो जाओ। बस। बाल लंबे करने तक की इजाजत नहीं थी क्योंकि ताऊजी को लगता था कि इससे ध्यान भटकेगा। लोग उन्हें काफी कुछ बोलते थे लेकिन ताऊजी की नजर सिर्फ ओलंपिक मेडल पर थी।" उस वक़्त गांव में नन्हीं विनेश को पता तक नहीं था कि आखिर ओलंपिक होता क्या है।
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विनेश फोगाट
मां ने अकेले पाला
वो बताती हैं, "हम ट्रेनिंग से इतने तंग आ चुके थे कि हमें लगता था: भाई कौन है ये? ओलंपिक कहां मिलता है? कोई इनको लाकर दे दो तो हमारा पीछा छूटे। सिर्फ ताऊजी को ही पता था कि वो कितना आगे की सोच रहे थे।" कहते हुए विनेश के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। धीरे-धीरे विनेश की मेहनत और ट्रेनिंग रंग लाने लगी। वो गांव से निकल राष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीतने लगीं। जिंदगी में टर्निंग प्वॉइंट तब आया जब 19 साल की उम्र में विनेश ने कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीता। ये अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक नई महिला पहलवान की दस्तक थी।
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विनेश फोगाट
पिता की हत्या कर दी गई...
हर खिलाड़ी की तरह विनेश भी यही कहती हैं कि हारना उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं। जूझने की ये क्षमता शायद विनेश को मां प्रेम लता से मिली है। अपनी सफलता के लिए वो ताऊ और मां को ही श्रेय देती हैं। विनेश बहुत छोटी थीं जब उनके पिता की हत्या कर दी गई। उस समय हरियाणा के रूढ़िवादी समाज में उनकी मां ने बतौर सिंगल मदर विनेश को पाला-पोसा।
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विनेश फोगाट - फोटो : social Media
जब टूटा ओलंपिक का सपना
वो बताती हैं, "जब तक पिताजी जिंदा थे, सब कुछ ठीक था। वो मुझे खेलते देख बहुत खुश होते थे लेकिन उनकी मौत के बाद सब कुछ बदल गया। गांव के लोग मम्मी को बोलने लगे कि बिन पिता की बेटी है, उसकी शादी करवा दो, बस। गीता-बबीता तो इसलिए खेल रही हैं क्योंकि उनके पिता हैं। गांव में किसी को नहीं लगता था कि मैं कुछ कर पाऊंगी। लेकिन मम्मी ने साफ कह दिया कि मेरी बेटी खेलेगी। हालात अच्छे नहीं थे लेकिन हमें सुविधाएं देने के लिए मां ने बहुत संघर्ष किया।"

विनेश ने बताया, "ताऊजी की ट्रेनिंग बहुत की मुश्किल होती थी। कई बार सोचती थी, सब छोड़ दूं लेकिन जब मम्मी को मेहनत करते हुए देखती थी तो मैंने भी अपने आप को अंदर से मजूबत करना सीख लिया।" कॉमनवेल्थ के बाद जब 2016 रियो ओलंपिक में भारतीय टीम गई तो 21 साल की विनेश से पदक पक्का माना जा रहा था लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। क्वार्टरफाइनल में अचानक विनेश को गंभीर चोट लग गई। देखते-देखते गेम बदल गया। दर्द से कराहती विनेश को स्ट्रेचर पर ले जाना पड़ा और ओलंपिक का सपना टूट गया।

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विनेश फोगाट
विनेश बताती हैं कि ये उनके करियर का सबसे मुश्किल दौर था जहां वो अपनी ही क्षमता पर शक करने लगी।

विनेश ने बताया, "मैंने लोगों को कहते हुए सुना था कि अगर खिलाड़ी एक बार गंभीर रूप से घायल हो जाए तो समझो करियर खत्म। मैंने खुद देखा भी था। तीन साल तक मेरी खुद से लड़ाई चलती रही कि क्या मैं ओलंपिक में वापसी कर पाऊंगी।"

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विनेश फोगाट - फोटो : social Media
हारना बिल्कुल पसंद नहीं...
इंटरव्यू का मूड अचानक बदल सा जाता है। एक सेंकेड के लिए ही सही विनेश की आंख भर आती है। लेकिन इससे पहले कि आपको एहसास हो, वो खुद को संभालते हुए आगे बढ़ जाती हैं- बिल्कुल अपनी गेम की तरह। जब एक सफल खिलाड़ी इस तरह के दौर से या दबाव या नाकामी से गुजरता है तो वो खुद को कैसे संभालता है? इस सवाल के जवाब में विनेश का एक अलग ही चेहरा देखने को मिला।

हमेशा चुलबुली से रहने वाली विनेश ने बताया, "जब भी मुझे कोई सवाल परेशान करता है तो मैं खुद से और भगवान से बात करती हूं। तीसरा कोई नहीं। मुझे किसी से दिल की बात करना पसंद नहीं है। दरअसल मैं किसी और को अपने मन की बात समझा ही नहीं पाती। मैं अपने आप से ही सवाल पूछती हूं और उनके जवाब भी खुद से ही लेती हूं। मेरे लिए यही काम करता है। सौभाग्यवश अभी तक कोई फैसला गलत साबित नहीं हुआ।"

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विनेश फोगाट - फोटो : ट्विटर
खैर, रियो ओलंपिक के बाद सर्जरी हुई और विनेश ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वापसी की। कभी सफलता मिली और कुछ नाकामियां भी। 2018 के एशियन गेम्स में वो गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय पहलवान बनीं।
कई मैच वो हारी भीं जिसके लिए लोग उनकी कमियां भी गिनाने लगी, खासकर ये कि बड़े मैच में स्टैनिमा में मार खा जाती हैं लेकिन विनेश की मेहनत, नया कोच और ट्रेनिंग की नई तकनीक की बदौलत विनेश ने जल्द ही सबको गलत साबित किया। वर्ल्ड चैंपियनशिप जिसमें वो हमेशा हार जाती थीं, 2019 में आखिरकर विनेश ने कांस्य पदक जीता।

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विनेश फोगाट - फोटो : सोशल मीडिया
दुनिया की चोटी की खिलाड़ी
आज विनेश दुनिया की चोटी की खिलाड़ी हैं। साल 2020 की शुरुआत उन्होंने रोम में गोल्ड मेडल जीतकर की है। कड़ी ट्रेनिंग और कुश्ती के दांव पेंच के बीच एक और व्यक्ति है जो विनेश के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहा है-सोमवीर राठी। सोमवीर खुद भी एक पहलवान हैं और विनेश को आठ साल से ज्यादा से जानते हैं। कुश्ती के दंगलों के बीच दोनों के बीच मोहब्बत भी परवान चढ़ने लगी थी। सोमवीर के बारे में विनेश कहती, "मेरे करियर के लिए उसने अपना करियर का नुक़सान किया है। एक वो ही है जो बिना कुछ कहे मेरे दिल की बात समझ सकता है।"

2018 में एशियन गेम्स से गोल्ड जीतने के बाद जब विनेश लौटीं, एयरपोर्ट पर ही सोमवीर ने प्रपोज किया और कुछ महीनों के अंदर दोनों की शादी भी हो गई। कुश्ती दोनों का जुनून है। वैसे कुश्ती से परे अगर कभी समय मिलता है तो विनेश म्यूजिक सुनना और फिल्में देखना पसंद करती हैं। हालांकि वो बताती हैं कि पिछले कुछ सालों में वो चंद ही फिल्में देख पाई हैं जिसमें उन्हें 'बाहुबली', 'चक दे' और 'अपने' अच्छी लगी।

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विनेश फोगाट
फिल्म स्टार्स में वो रणवीर सिंह, अक्षय कुमार, कंगना और दीपिका की फैन हैं। विनेश का एक और बड़ा शौक़ है- खाना। वो खद की फूडी बताती हैं। वो कहती हैं, "मरने से पहले मैं हर मुमकिन खाना टेस्ट करना चाहती हूं। मेरे सपनों में से एक सपना है कि मैं पूरी दुनिया घूमूं और हर तरह के व्यजंन खा डालूं।" अपने ऊपर खुद ही जोर-जोर से हंसती विनेश बोलती चली जाती हैं।
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विनेश फोगाट - फोटो : social Media
अधूरे सपने को पूरा करने की ख्वाहिश
तो लजीज खाना विनेश को खुश करने का बढ़िया तरीका है लेकिन क्या इस पहलवान को गुस्सा भी आता है? खुराफाती मुस्कान के साथ विनेश कहती हैं, "मुझे बहुत गुस्सा आता है। और जब गुस्सा आता है तो मैं तोड़ फोड़ भी कर सकती हूं"। बचपन में तो विनेश को बाल बड़े करने का मौका नहीं मिला तो वो अब अपना शौक़ पूरा कर रही है। विनेश के पास किस्सों का खजाना है। एक किस्सा सुनाते हुए विनेश बताती हैं, "नेशनल कैंप में एक बार लंबा वक़्त रह गई तो बाल बड़े हो गए। घर आई तो ताऊजी बोले, बुलाओ नाई। मैं घर की अलमारी में छिप गई और मम्मी ने उसे बाहर से बंद कर दिया।"

विनेश अपने कई शौक़ और सपने पूरे कर चुकी हैं। अब विनेश का सबसे बड़ा सपना क्या है? बिना पलक झपके विनेश तपाक से जवाब देती है, "बहुत कम लोगों को जिंदगी में दूसरा मौका मिलता है। मुझे दूसरा मौका मिला है ओलिंपक में खेलने का। मैं ओलंपिक मेडल जीतने का अपना सपना पूरा करना चाहती हूं।" कहते-कहते जैसे वो अपने ही खयालों में खो गई। अब हमारा इंटरव्यू उस मकाम पर पहुंच चुकी थी जहां लगा मानो किसी फिल्म का क्लाइमेक्स आ गया हो। और यहां से आगे फिल्म 'द एंड' ही हो सकती है।

विनेश का फिलहाल एक ही लक्ष्य है- टोक्यो 2020। 2016 के अधूरे सपने को मुकम्मल करना।
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