आमतौर पर माना जाता है कि मछली और दूध का कॉम्बिनेशन शरीर के लिए नुकसानदेह होता है। लेकिन नारियल के दूध और झींगा मछली से बनी बंगाली डिश डाभ चिंगड़ी ना सिर्फ सेहत के लिहाज से बल्कि मिर्च मसालों से दूरी बनाकर चलने वालों के लिए जबरदस्त ऑप्शन है।
बंगाली खानपान में सीफूड खासकर प्रॉन्स की बात ही कुछ अलग है। विशेष मसालों और नारियल की मलाई के साथ तैयार डाभ चिंगड़ी यानी प्रॉन्स को जब नारियल के खोल में पेश किया जाता है, तो यह डिश देखने लायक होती है। नारियल के दूध की हल्की-सी मिठास का बहुत अच्छा मेल झींगे के कुदरती स्वाद के साथ होता है।
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Daab Chingri
हिंदी पट्टी में रहने वालों के लिए अभी कुछ समय पहले तक डाभ एक अपरिचित नाम था और चिंगड़ी भी एक दुर्लभ खाद्य पदार्थ। ‘डाभ’ यानी हरा नारियल और ‘चिंगड़ी’ अर्थात् झींगा मछली। हरा नारियल लगभग सभी जगह नजर आता है, जिसका मीठा पानी किसी भी बोतलबंद कोल्ड ड्रिंक को आसानी से मात दे सकता है। कुछ लोग नारियल के पानी के नहीं, उसकी मलाई के दीवाने होते हैं और अपनी पसंद के अनुसार ही नारियल कटवाते हैं।
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जितना बड़ा झींगा, फायदा उतना
भारत के तटवर्ती इलाके बंगाल, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, गोवा और महाराष्ट्र सभी जगह नारियल का कई प्रकार से खानपान में इस्तेमाल होता है। बंगाल और उड़ीसा में ही हरा नारियल डाभ के नाम से जाना जाता है और इसी भू-भाग में झींगा मछली चिंगड़ी कहलाती है। बंगाली खानपान में 'डाभ चिंगड़ी' नामक व्यंजन का खास स्थान है। उत्तर भारतीयों का आमतौर पर यह मानना है कि झींगा जितने बड़े आकार का होता है, वह उतना ही अच्छा होता है, इसलिए मछली बाजार में टाइगर प्रॉन या जम्बो प्रॉन्स सबसे महंगे बिकते हैं।
मजे की बात यह है कि खाने में छोटे आकार की झींगा मछली ही सबसे जायकेदार होती है और इसलिए ‘चिंगड़ी’ में इसका इस्तेमाल किया जाता है। यूं तो बंगाली खानपान में चिंगड़ी को लौकी और बंगाली बड़ी के साथ भी पकाया जाता है और नारियल के दूध में इसकी मलाई करी भी पेश की जाती है। यह माना जाता है कि इसकी मूल पाक विधि प्रायद्वीप से भारत तक पहुंची थी।
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Daab Chingri
विदेशी मेहमानों को जरूर पसंद आएगी ये डिश
‘डाभ चिंगड़ी’ का सबसे आकर्षक पक्ष यह है कि इसे हरे नारियल के ‘पात्र’ में ही औपचारिक अवसरों पर या रेस्तरों में पेश किया जाता है। अभी कुछ दिन पहले प्रयोग प्रेमी एक भारतीय शेफ ने बैंकॉक में हर मेहमान के सामने एक नन्हे से नारियल के भीतर 5-6 चिंगड़ी रखकर सबको मंत्रमुग्ध कर दिया था। यह व्यंजन विदेशी मेहमानों को खासकर रुचिकर लगता है, क्योंकि इसमें मिर्च तो नाममात्र को भी नहीं होती और बंगाली मछलियों में सरसों के कारण जो तीखापन होता है, वह भी गैरहाजिर रहता है।
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डबल ट्रीट है नारियल के दूध और झींगा मछली का ये कॉम्बिनेशन
नारियल के दूध की हल्की-सी मिठास का बहुत अच्छा मेल झींगे के कुदरती स्वाद के साथ होता है। भारत के पश्चिमी तटवर्ती इलाके में खासकर मैंगलोर, गोवा और महाराष्ट्र में, जो शोरबेदार झींगा खाने को मिलता है, उसमें मसाला खासा तेज रहता है और उसकी रंगत सुर्ख होती है। कहीं खटास इमली से पैदा की जाती है, तो कहीं टमाटर से।
कहीं-कहीं लहसुन और प्याज को पीसकर मसाले को गाढ़ा करते हैं और गरम मसाले के प्रयोग से झींगे के कुदरती स्वाद का आनंद लेना जरा कठिन हो जाता है। इनकी तुलना में ‘डाभ चिंगड़ी’ बनाना और खिलाकर मेहमानों को रिझाना कहीं अधिक सहज है।
यहां एक और बात जोड़ने की जरूरत है कि आमतौर पर उत्तर भारत के सामिष व्यंजनों की तरी गाढ़ी होती है, क्योंकि उनकी जुगलबंदी रोटी या पराठों के साथ होती है। बंगाल में खाया जाने वाला प्रमुख अनाज चावल है और इसलिए ‘डाभ चिंगड़ी’ की तरी जरा पतली रहती है। मगर ताजे नारियल की गिरी को निचोड़कर, जो दूध निकाला जाता है वह पहली बार ‘दुहने’ पर गाढ़ा होता है और दूसरी बार पतला। आप अपनी पसंद के अनुसार ‘डाभ चिंगड़ी’ की तरी को इस दूध से मनपसंद गाढ़ापन प्रदान कर सकते हैं।