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World Schizophrenia Day 2020: दिमाग से जुड़ी अजीब बीमारी है सिजोफ्रेनिया, बना सकती है 'कातिल'

Sun, 24 May 2020 03:41 PM IST
निलेश कुमार लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सिजोफ्रेनिया(सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
कोरोना महामारी के इस लॉकडाउन पीरियड में स्वास्थ्य विशेषज्ञ और डॉक्टर लगातार शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मेंटल हेल्थ यानी मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देने की बात कह रहे हैं। मानसिक तौर पर खुद को मजबूत बनाए रखने के लिए अपने आप को कलात्मक और रचनात्मक गतिविधियों में व्यस्त रखने की सलाह दी जा रही है। साथ ही सोशल डिस्टेंसिंग के इस दौर में अपने दोस्तों, परिजनों से वीडियो कॉल के जरिए बात करते रहना भी इसका हल है। खैर, यहां आज हम बात कर रहे हैं मानसिक स्वास्थ्य से ही जुड़ी एक बीमारी सिजोफ्रेनिया के बारे में। हर साल विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से ‘मेंटल हेल्थ अवेयरनेस वीक’ मनाया जाता है और 24 मई को ‘वर्ल्ड सिजोफ्रेनिया डे’ मनाया जाता है। 
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सीजोफ्रेनिया(सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
क्या है सिजोफ्रेनिया
  • सिजोफ्रेनिया मेंटल हेल्थ से जुड़ी एक गंभीर बीमारी है, जिसका असर व्यक्ति के व्यवहार और भावनाओं पर पड़ता है। इस बीमारी में मरीज अपने मन के भाव चेहरे पर प्रकट नहीं कर पाता है। आंकड़ों के मुताबिक, प्रति एक हजार लोगों में से तीन लोग इस बीमारी के शिकार होते हैं। देश में ऐसे रोगियों की संख्या 35 लाख से ज्यादा बताई जाती है। 
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सिजोफ्रेनिया (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
  • सिजोफ्रेनिया के लक्षण: 
डिलूजन (Delusion )
  • इसमें व्यक्ति को लगता है कि कोई उसे मारना चाहता है। उसके खिलाफ कोई साजिश चल रही है और सभी लोग मिले हुए हैं। 
  • उसे लगता है कि कोई उसके खाने में जहर न मिला दे या फिर पुलिस उसके पीछे पड़ी है। 
  • अक्सर उसे लगता है कि लोग उसके बारे में ही बात कर रहे हैं या उसे देखकर हंस रहे हैं। 

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सिजोफ्रेनिया(सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Pexels
हल्यूसनेशन (Hallucinations)
  • कोई कुछ नहीं बोलता, तो भी मरीज को आवाजें सुनाई पड़ती है। वह कान लगाकर बातें सुनने की कोशिश करने लगता है। 
  • कई बार तो उसे वे चीजें भी दिखाई देने लगती है, जो वास्तव में होती ही नहीं। 
ये गतिविधियां उसके व्यवहार को प्रभावित करती हैं। 
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सिजोफ्रेनिया (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : social media
दुनिया से मतलब नहीं
  • इस बीमारी में व्यक्ति की भावनाएं खत्म होने लगती है। उन्हें दुनिया और यहां तक कि परिवार से भी मतलब नहीं रह जाता। उनके चेहरे पर न्यूट्रल भाव रहता है, न दुख न ही खुशी।
  • वे सामाजिक रूप से लोगों से मिलना-जुलना पसंद नहीं करते। अकेलापन अच्छा लगने लगता है। घूमने की इच्छा खत्म होने के अलावा किसी काम में मन नहीं लगता। 
  • ऐसे मरीज अकेले में बातें करते हैं। ब्रश करने, नहाने जैसी सामान्य दिनचर्या भी भूल जाते हैं। ऐसे मरीजों को नशे की भी लत लग जाती है। 
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सिजोफ्रेनिया (सांकेतिक तस्वीर)
केमिकल लोचा के कारण बनते हैं मनोरोगी
दिमाग का पहला हिस्सा (फ्रंटल लॉब) और बीच का हिस्सा (मिड ब्रेन) इस बीमारी से प्रभावित होते है। दोनों हिस्सों में केमिकल बदलाव के कारण यह बीमारी हो सकती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि इस बीमारी में मिड ब्रेन में डोपामाइन का स्तर ज्यादा हो जाता है जबकि फोरब्रेन में इसकी कमी हो जाती है। फोरब्रेन में सेरॉटोनिन की मात्रा भी कम हो जाती है। दरअसल, दिमाग के एक्टिव रहने में मददगार डोपामाइन और सेरॉटोनिन की तरह ग्लूटामेट की मात्रा भी असंतुलित हो जाती है। सोचने की क्षमता, अपनी भावनाओं और व्यवहार को नियंत्रित करने में इन हार्मोन्स का अहम रोल होता है। इनमें असंतुलन के कारण यह बीमारी होती है। 
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सिजोफ्रेनिया (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
समय पर इलाज जरूरी
  • मनोचिकित्सक बताते हैं कि इस बीमारी का समय से इलाज न हो तो खतरनाक स्थिति पैदा हो सकती है। व्यक्ति अपना संतुलन खो देता है और अपना ही दुश्मन बन जाता है।
  • खुद की हत्या के प्रयास जैसे कई उदाहरण देखे गए हैं। स्थिति बहुत गंभीर हो जाए तो गुस्से पर संतुलन नहीं रहने से मरीज घर के किसी सदस्य या अन्य लोगों की हत्या भी कर सकता है।
  • समय पर इलाज ना मिलने पर व्यक्ति का फोकस पढ़ाई, जॉब, करियर, फैमिली किसी भी चीज पर नहीं रहता। उसकी जिंदगी बर्बाद हो सकती है।
इसलिए शुरुआती लक्षणों के दिखते ही मनोचिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। 
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