ईसीटी थेरेपी से गंभीर अवसाद में मिलता है लाभ
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ईसीटी को लेकर डर क्यों है?
डॉ ओमप्रकाश कहते हैं, मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर समाज में बड़ी स्टिग्मा है। ईसीटी जैसे प्रभावी उपचार माध्यमों के प्रयोग में आती कमी के लिए भी इसी स्टिग्मा को एक कारण माना जा सकता है। ईसीटी में रोगी के मस्तिष्क में विशेष उपकरणों की मदद से विद्युत उत्तेजना बढ़ाई जाती है। फिल्मों में इस थेरपी का इतना गलत चित्रण किया गया है जिसने लोगों में इस प्रभावी थेरेपी को लेकर डर बना दिया है, जबकि असलियत बिल्कुल अलग है।
फिल्मों में जिस तरह से दिखाया जाता है कि ईसीटी काफी दर्दकारक है,रोगी छटपटाता है, लोग उसे पकड़कर रखते हैं, वास्तविकता में ऐसे कुछ भी नहीं है। इस तरह के भ्रम के कारण ईसीटी जैसी प्रभावी थेरपी से लोग दूर भागते हैं। इसकी प्रक्रिया और प्रभावों के बारे में जानना बहुत आवश्यक है।
ईसीटी कैसे दी जाती है?
जिस तरह से फिल्मों में दिखाया जाता है, उससे बिल्कुल अलग ईसीटी प्रशिक्षित विशेषज्ञों की निगरानी में रोगी को एनस्थीसिया देकर की जाने वाली प्रक्रिया है, जिसमें बहुत निम्न स्तर का एहसास होता है। ईसीटी उपचार के पहले रोगी की कई स्तर पर जांच की जाती है। उपचार के समय मरीज को जनरल एनस्थीसिया दी जाती है। खोपड़ी पर मसल रिलैक्सेंट और इलेक्ट्रोड लगाए जाते हैं, जिसके माध्यम से रोगी का मस्तिष्क उत्तेजित होता है। नियंत्रित रूप से प्रशिक्षित पेशेवर इलेक्ट्रिकल प्लसेज के माध्यम से शॉक देते हैं, जिससे मस्तिष्क की उत्तेजना बढ़ाई जाती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात इस प्रक्रिया के दौरान रोगी अचेतन अवस्था में होता है और 5-10 मिनट के बाद जाग जाता है। थेरपी पूरी होने के बाद उसे हल्की सर्जरी जैसा एहसास होता है, रोगी को कुछ घंटे के बाद घर भी भेज दिया जाता है। यह पूरी तरह से सुरक्षित प्रक्रिया है।