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भारत में महिलाएं क्यों निकलवा रही हैं गर्भाशय?

Tue, 27 Aug 2019 04:03 PM IST
पंखुड़ी सिंह लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
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- फोटो : pixa
इस देश में माहवारी लंबे समय से एक टैबू बना हुआ है, माहवारी में महिलाओं को अपवित्र माना जाता है और अभी भी उन्हें सामाजिक और धार्मिक आयोजनों से अलग रखा जाता है। हाल के सालों में ये पुरातन विचारों को लगातार चुनौती दी जाती रही है, ख़ासकर शहरी पढ़ी लिखी महिलाओं की ओर से। लेकिन ये दो घटनाएं इस बात की तस्दीक करती हैं कि माहवारी से संबंधित भारत की ये समस्या अभी भी जारी है। महिलाओं की एक बड़ी संख्या, खासकर जो ग़रीब परिवारों से आती हैं और शिक्षित भी नहीं होती हैं, उनपर ऐसे विकल्प चुनने का दबाव डाला जाता है जो उनकी ज़िंदगी और सेहत पर लंबा और स्थायी असर डालने वाला होता है।

 
 
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- फोटो : pixa
पहली घटना महाराष्ट्र की है जहां पिछले तीन साल में हज़ारों महिलाओं को गर्भाशय निकालने के लिए ऑपरेशन कराना पड़ा है. ये संख्या अच्छी खासी है. ऑपरेशन इसलिए कराना पड़ा ताकि उन्हें गन्ने के खेत में काम मिल सके। हर साल सोलापुर, सांगली, उस्मानाबाद, बीड़ जैसे ज़िलों से दसियों हज़ार ग़रीब परिवार पलायन कर राज्य के संपन्न पश्चिमी इलाक़े में आते हैं जहां उन्हें गन्ने के खेतों में छह महीने के लिए काम मिलता है। एक बार जब वो पहुंचते हैं, उसके बाद उनकी ज़िंदगी उन लालची ठेकेदारों के हाथ में होती है जो उनका शोषण करने का कोई मौका नहीं छोड़ते। 

 
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- फोटो : pixa
30 से कम उम्र की महिलाएं शिकार
गन्ना कटाई का काम कड़ी मेहनत वाला होता है, इसलिए वे महिलाओं को काम देने के प्रति उदासीन होते हैं और दूसरा कारण ये भी है कि माहवारी के दिनों में महिलाएं एक या दो दिनों के लिए काम पर नहीं आती हैं।अगर उनसे एक दिन का काम भी छूट जाए तो उन्हें जुर्माना भरना पड़ता है। काम की जगह पर उनके रहने के हालात बहुत बुरे हैं, परिवारों को खेत के पास बनी झोपड़ी या टेंटों में रहना पड़ता है, जहां कोई टॉयलेट नहीं होता और चूंकि कभी कभी रात में भी गन्ने की कटाई होती है तो उनके सोने उठने का भी कोई निश्चित समय नहीं होता है। और जब महिलाएं माहवारी में होती हैं, ये उनके लिए और कठिन हो जाता है। साफ़ सफ़ाई की बहुत अच्छी स्थिति न होने के कारण अधिकांश महिलाओं को संक्रमण हो जाता है. इन इलाकों में काम करने वाले समाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ये महिलाएं डॉक्टर के पास जाती हैं तो वे लालची डॉक्टर ग़ैरज़रूरी ऑपरेशन करवाने के लिए कहते हैं, भले ही वो दिक्कत दवा से ठीक हो सकती हो।

 

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- फोटो : pixa
इन इलाकों में अधिकांश महिलाओं की कम उम्र में ही शादी हो जाती है, इसलिए 20 से 30 साल की उम्र तक आते आते ये दो या तीन बच्चों की मां बन चुकी होती हैं। चूंकि डॉक्टर उन्हें गर्भाशय निकलवाने के ऑपरेशन से जुड़ी समस्याओं के बारे में नहीं बताते इसलिए उनमें से अधिकांश महिलाएं मानती हैं कि गर्भाशय से छुटकारा पाना ही ठीक है। इसकी वजह से इन इलाक़ों में अधिकांश गांव तो "गर्भाशय विहीन महिलाओं के गांव" में तब्दील हो गए हैं। गांव जहां 90 फीसदी महिलाओं के गर्भाशय हटा दिए गए

 
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- फोटो : pixa
'बिन गर्भाशय वाली महिलाओं का गांव'
जब पिछले महीने महाराष्ट्र के विधानसभा में विधायक निलम गोरहे ने इस बारे में सवाल उठाया तो राज्य के स्वास्थ्य मंत्री एकनाथ शिंदे ने स्वीकार किया कि बीते तीन साल में केवल बीड़ में 4,605 महिलाओं के गर्भाशय निकाले गए हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि ये सारे मामले सिर्फ गन्ने के खेत में काम करने वाली महिलाओं से ही संबंधित नहीं है। मंत्री ने कहा कि बहुत से मामलों की जांच के लिए एक कमेटी गठित की गई थी. बीड़ के गांव वंजारवाड़ी का दौरा किया करने वाली बीबीसी मराठी की मेरी सहयोगी प्रजाक्ता धुलप कहती हैं कि हर साल अक्टूबर से मार्च के बीच 80 प्रतिशत ग्रामीण गन्ने के खेतों में काम करने के लिए पलायन कर जाते हैं।

 
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- फोटो : pixa
इस गांव में आधी महिलाएं ऐसी थीं जिनका गर्भाशय निकाला जा चुका था, इनमें अधिकांश 40 साल से कम उम्र की थीं और कुछ की उम्र 30 से भी कम थी। कुछ ऐसी महिलाओं से भी उनकी मुलाक़ात हुई जिन्होंने बताया कि जबसे उनका ऑपरेशन हुआ है उनकी सेहत और बिगड़ गई है। एक महिला ने बताया कि उसकी गर्दन, पीठ और घुटने में लागातर दर्द बना रहता है और जब वो सुबह उठती है तो उसके हाथ, पैर और चेहरे पर सूजन रहती है। एक अन्य महिला ने लगातार चक्कर आने की शिकायत की और बताया कि वो थोड़ी दूर तक भी पैदल चलने में असमर्थ हो चुकी है। इसके कारण वे दोनों अब खेतों में काम करने लायक बचे ही नहीं हैं।



 
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- फोटो : Social Media
पीरियड्स में दर्द की दवाई
दूसरी ख़बर भी इतनी ही चिंताजनक है और ये ख़बर तमिलनाडु से आई है. यहां अरबों के कारोबार वाले गारमेंट उद्योग में पीरियड के दौरान दर्द की शिकायत करने वाली महिलाओं को छुट्टी की बजाय बिना लेबल वाली दवाएं दी जाती हैं। थॉम्सन रॉयटर्स फ़ाउंडेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार, ये दवाएं बिना किसी अनुभवी स्वास्थ्यकर्मी के ही दी जाती हैं. फ़ाउंडेशन ने ये रिपोर्ट 100 महिलाओं के साक्षात्कार के आधार पर तैयार की। अधिकांश महिलाएं ग़रीब परिवारों से आती हैं और उनका कहना है कि माहवारी की दर्द के कारण एक दिन की दिहाड़ी भी छोड़ना उनके लिए मुश्किल है।
 
इन सभी महिलाओं ने कहा कि उन्हें ये दवाएं मिली थीं, जबकि इनमें से आधी महिलाओं ने कहा कि इन दवाओं के कारण उनकी सेहत पर बुरा असर पड़ा है। इनमें से अधिकांश ने स्वीकार किया कि दवा देते समय उन्हें इसका नाम नहीं बताया गया या इनके साइड इफ़ेक्ट के बारे में कोई चेतावनी भी नहीं दी गई। अधिकांश महिलाओं की शिकायत थी कि दवाओं की वजह से उन्हें कई तरह की स्वास्थ्य दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, डिप्रेशन और बेचैनी से लेकर पेशाब में दिक्कतें और गर्भपात तक। इन रिपोर्टों की वजह से प्रशासन पर कार्रवाई का दबाव पड़ा. राष्ट्रीय महिला आयोग ने महाराष्ट्र में महिलाओं की स्थिति को 'बहुत दर्दनाक और दयनीय' क़रार दिया और राज्य सरकार से भविष्य में ऐसे उत्पीड़न को रोकने के लिए कहा।


 

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कामकाजी महिलाओं में आई कमी
तमिलनाडु सरकार ने कहा है कि वे गारमेंट वर्करों की सेहत पर वो निगरानी रखेगी। ये ख़बरें ऐसे समय आई हैं जब पूरी दुनिया में इस बात की कोशिश हो रही है कि लैंगिक रूप से संवेदनशील नीतियां लागू की जाएं ताकि कामकाजी महिलाओं की संख्या बढ़े। लेकिन ये चिंताजनक है कि भारत में नौकरियों में महिलाओं की हिस्सेदारी घटी है. साल 2005-06 के बीच जहां इनकी हिस्सेदारी 36% थी वहीं 2015-16 में ये घटकर 25.8% रह गई। और जब महिलाओं के लिए काम की स्थितियां हम देखते हैं तो इसका कारण समझना मुश्किल नहीं रह जाता। इंडोनेशिया, जापान, दक्षिण कोरिया और कुछ अन्य देशों में माहवारी के दौरान महिलाओं को एक दिन की छुट्टी दी जाती है. कई निजी कंपनियां भी ऐसा ही करती हैं।

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- फोटो : pixa
भारत सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग में पब्लिक पॉलिसी विशेषज्ञ के रूप में काम करने वाली उर्वशी प्रसाद के अनुसार, "भारत में भी बिहार सरकार ने 1992 से ही महिलाओं के लिए हर महीने दो दिनों की अतिरिक्त छुट्टी लेने की सुविधा दे रखी है।" पिछले साल, एक महिला सांसद ने संसद में 'मेंस्ट्रुअल बेनेफ़िट्स बिल' पेश किया था जिसमें देश की कामकाजी महिलाओं के लिए हर महीने दो दिन की अतिरिक्त छुट्टी का प्रावधान बनाए जाने की मांग की गई थी। उर्वशी प्रसाद कहती हैं कि भारत जैसे विाल देश में किसी भी नीति को लागू करने की अपनी चुनौतियां हैं, ख़ासकर असंगठित क्षेत्र में जहां निगरानी की बहुत अधिक ज़रूरत है। वो कहती हैं कि अगर संगठित क्षेत्र में एक शुरुआत की जाए तो इससे मानसिकता में बदलाव का संकेत जा सकता है और इससे माहवारी से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने में मदद मिल सकती है।



 
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क़ानून
वो कहती हैं, "इसलिए ज़रूरत है कि ताक़तवर संगठित निजी क्षेत्र और सरकार इस पर अपना पक्ष स्पष्ट करे. ज़रूरत है कि शीर्ष पर जो लोग हैं वो सही संदेश दें।" वो कहती हैं, "हमें कहीं से तो शुरुआत करनी होगी और इस तरह हम असंगठित क्षेत्र में कुछ बदलाव देखने की उम्मीद कर सकते हैं।" मेंस्ट्रुअल बेनिफ़िट्स बिल एक निजी बिल था, इसलिए इसका बहुत असर होगा इसकी कम ही उम्मीद है, लेकिन अगर ये क़ानून बन जाता है तो इससे तमिलनाडु के गारमेंट फ़ैक्ट्रियों में काम करने वाली महिलाओं को फ़ायदा होगा क्योंकि यहां भी ये क़ानून लागू करना पड़ेगा। लेकिन इस तरह के कल्याणकारी उपायों से शायद ही उन लोगों को फ़ायदा पहुंचता है जो असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, इसका मतलब है कि महाराष्ट्र के गन्ना के खेतों में काम करने वाली महिलाएं अपने ठेकेदारों के रहमो करम पर ही रहेंगी।
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