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Health Alert: हड्डियों से लेकर दिमाग तक पर असर डालता है विटामिन-डी, भारत में 80% लोगों में इसकी कमी

Thu, 16 Oct 2025 07:59 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार आमतौर पर 30-50 नैनोग्राम/मिलीलीटर का स्तर सामान्य माना जाता है। हालांकि भारत में यह स्तर औसतन  नैनोग्राम/मिलीलीटर तक देखा जा रहा है है।
  • देश में भी करीब 70–80% आबादी में विटामिन डी की कमी होना काफी चिंताजनक है। 
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भारतीय लोगों में विटामिन-डी की कमी - फोटो : Freepik.com
अच्छी सेहत चाहते हैं तो आहार पर सबसे ज्यादा ध्यान देना जरूरी हो जाता है, स्वास्थ्य विशेषज्ञ सभी लोगों को खान-पान में पर्याप्त पोषक तत्वों वाली चीजों को शामिल करने की सलाह देते हैं। अध्ययनों से ये भी पता चलता है कि अगर हम अपने आहार में ही सुधार कर लेते हैं तो इससे कई प्रकार की क्रॉनिक बीमारियों के खतरे को कम किया जा सकता है। क्या आपको आहार से शरीर के लिए जरूरी सभी पोषक तत्व मिल रहे हैं?

इस संबंध में आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। भारत में विटामिन-डी की कमी तेजी से बढ़ती जा रही है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में ये समस्या देखा जी रही है। हड्डियों की सेहत के लिए जरूरी इस विटामिन की कमी के चलते कम उम्र में ही लोगों को हड्डियों में दर्द, आर्थराइटिस जैसी समस्याओं का शिकार होना पड़ रहा है। 

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, भारत जैसे देश जहां हर सीजन में पर्याप्त धूप रहती है वहीं देश में भी करीब 70–80% आबादी में विटामिन डी की कमी होना काफी चिंताजनक है। अगर समय रहते इसमें सुधार न किया गया तो आने वाले दशकों में देश के बड़ी आबादी में आर्थराइटिस, इम्युनिटी की कमजोरी सहित कई तरह की बीमारियों का खतरा हो सकता है।
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धूप वाले देश में विटामिन डी की कमी - फोटो : Adobe Stock
भारतीय आबादी में बढ़ती विटामिन-डी की कमी

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार आमतौर पर 30-50 नैनोग्राम/मिलीलीटर विटामिन-डी का स्तर सामान्य माना जाता है। हालांकि भारत में यह स्तर औसतन  नैनोग्राम/मिलीलीटर तक देखा जा रहा है है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, शहरी जीवनशैली, घरों और ऑफिस में ज्यादा समय बिताना, सनस्क्रीन का अत्यधिक प्रयोग और पोषण की कमी इसका प्रमुख कारण हैं।

ज्यादातर लोगों का पूरे दिन ऑफिस में रहने के कारण सूर्य की रोशनी से संपर्क नहीं हो पाता है जो इस विटामिन का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, रोजाना हल्की धूप लेना, प्रोटीन युक्त आहार के साथ विटामिन-डी वाली चीजों को आहार में शामिल करना सेहत को ठीक रखने के लिए जरूरी है।
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हड्डियों की समस्या - फोटो : Freepik.com
विटामिन-डी की कमी से हड्डियों की समस्या

विटामिन डी, शरीर में कैल्शियम और फॉस्फोरस के संतुलन को बनाए रखने के लिए जरूरी है, जिससे हड्डियां मजबूत रहती हैं। इसके अलावा ये इम्यून सिस्टम ठीक रखने और दिमाग-मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी है। ऐसे में इस पोषक तत्व की कमी का संपूर्ण स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर हो सकता है। 

विटामिन-डी का मुख्य काम है कैल्शियम को शरीर में अवशोषित करने में मदद करना। इसकी कमी से शरीर में कैल्शियम का सही से उपयोग नहीं हो पाता  जिससे हड्डियां कमजोर होने लगती हैं।

नेशनल इंस्टीट्यूटऑफ न्यूट्रिशन की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 50% से ज्यादा महिलाएं और बुजुर्गों में ऑस्टियोपोरोसिस यानी हड्डियों के कमजोर की समस्या देखी जाती है, जिसका मुख्य कारण विटामिन-डी की कमी हो सकती है।

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मेंटल हेल्थ की समस्या - फोटो : Freepik.com
मानसिक स्वास्थ्य की भी बढ़ सकती है दिक्कतें

विटामिन-डी सिर्फ हड्डियों के लिए ही नहीं, दिमाग के लिए भी जरूरी है। यह मूड को अच्छा रखने वाले हार्मोन सेरोटोनिन को बढ़ाता है। नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन की रिपोर्ट के अनुसार, जिन लोगों में विटामिन-डी की कमी होती है उनमें डिप्रेशन का खतरा 65% तक अधिक हो सकता है। इसके अलावा विटामिन-डी की कमी से मूड स्विंग्स, बेचैनी, नींद की कमी और ध्यान की कमी जैसी दिक्कतें भी हो सकती हैं।
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इम्युनिटी कमजोर होने की समस्या - फोटो : Adobe stock photos
इम्यून सिस्टम पर भी पड़ता है असर 

कोरोना के दिनों में जब लोगों को इम्युनिटी बढ़ाने वाले उपाय करने की सलाह दी जा रही थी तो आहार में विटामिन-सी और डी दोनों को शामिल करने पर जोर दिया जा रहा था।

विटामिन-डी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में मदद करता है। इसकी कमी से शरीर वायरस और बैक्टीरिया के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो जाता है। आईसीएमआर ने एक रिपोर्ट में बताया कि जिन लोगों में विटामिन डी की कमी होती है उनमें बार-बार सर्दी, फ्लू, या श्वसन संक्रमण का खतरा हो सकता है।




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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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